शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

*४८. सतगुरु कौ अंग १/३*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४८. सतगुरु कौ अंग १/३*
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ॐ नमो* परम पुरिष परमात्मानं, गुरु गम्य सतगुरु लयं ।
जगजीवन जन तस्य शिष्यं, दण्डवत जय जय जयं* ॥१॥
*-*. संस्कृत भाषा में-
परम पुरुष परमात्मा को नमस्कार है, जो गुरु की कृपा से ही प्राप्त होते हैं और सतगुरु में ही लीन हैं । मैं उनका शिष्य जगजीवन, उन्हें बार-बार दण्डवत प्रणाम करता हूँ ।
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पुरुषं परमात्मानं, गुरुगम्य गुरोर्लयम् ।
जगजीवननामाहं, शिष्यःसन् प्रणमामि तम् ॥१॥
परम पुरुष परमात्मा को नमस्कार है, जो केवल गुरु की कृपा से ही प्राप्त होते हैं और जो सतगुरु में ही लीन हैं । मैं जगजीवन, उनका शिष्य होकर, उन्हें प्रणाम करता हूँ ।
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नमो रांमं नमो नांमं, नमो सतगुरु बन्दनम् ।
जगजीवन नमो गुरु दादू, कोटि कर्म निकन्दनम् ॥२॥
संत जगजीवनजी महाराज कहते हैं, राम को नमस्कार, राम नाम को नमस्कार, सतगुरु की वंदना को नमस्कार । गुरु दादू को नमस्कार, जो करोड़ों कर्मों का नाश करने वाले हैं ।
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रांम नांम अक्षर उभयं, गुरु शिष्य उपदेशितं ।
जगजीवन सतगुरु साधनं, प्रणामं पारं गतं ॥३॥
राम नाम के दो अक्षर ही गुरु ने शिष्य को उपदेश रूप में दिए हैं । संत जगजीवनजी कहते हैं, सतगुरु की साधना ही प्रणाम है और यही भव से पार ले जाने वाली है ।
(क्रमशः)

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