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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*सद्गुरु चरणां मस्तक धरणा,*
*राम-राम कहु दुस्तर तिरणा ।*
*अठ सिधि नव निधि सहजैं पावे,*
*अमर अभय पद सुख में आवे ॥*
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भीमराजजी के निश्चय और वैराग्य को देखकर प्रहलादजी को भी वैराग्य हुआ किन्तु उनको एक बार घर जाकर सब समाचार कहना था । अतः वे घर गये । सब समाचार कहे । तब घर वाले भीमराज को लाने का विचार करने लगे किन्तु प्रहलादजी ने उन्हें यह कर रोक दिया कि वे अब नहीं आयेंगे । तुम उनके पास मत जाओ जाने से उनके भजन में विघ्न होगा । प्रहलादजी के रोकने पर घरवाले उनको लाने व मिलने नहीं गये किन्तु प्रहलादजी ने पुनः उनके पास जाने का विचार स्थिर रखा ।
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इधर भीमराज ने अपने हथियार, घोड़ा और राजसी ठाठ बाट के वस्त्र आदि छोड़कर एक सच्चे जिज्ञासु के समान अपना रहन सहन बना लिया । सोई कहा है—
मू. छ.- देश को लोग मिल्यो मथुरा मधि, आय कहे समचार सती के ।
अब तो घर जाउं नहीं वृह¹ उपज्यो, जाय परू काहु पाय जती के ॥
तजे हथियार तुरी² चढ़बो, सब आयुध छाड़ दिये गृहस्थी के ।
राघो कहै सत सुन्दरदास जि, चाल गये गुरु ज्ञान पती के ॥४८९॥
¹विरह ²घोड़ा । एक दिन भीमराजजी ने अपने पंडे से पूछा— यहां आसपास में कोई उच्च कोटि का सन्त है क्या ? यदि हो तो उसका परिचय मेरे को दो और उनके पास मेरे को ले चलो । पंडे ने कहा— आजकल यहां निम्बार्क सम्प्रदाय के एक संत चतुरानागाजी प्रसिद्ध हैं । ब्रज में वे ही आज- कल सर्वश्रेष्ठ संत माने जाते हैं ।
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इन्ही दिनों में प्रहलादजी भी लौटकर भीमराज के पास आ गये थे । फिर भीमराजजी ने पंडे को कहा— अब तुम हमको चतुरानागाजी के पास ले चलो । फिर भीमराजजी ने दीक्षा लेने योग्य सामग्री— चादर, प्रसाद, पुष्पादि, पूजा की सभी वस्तुयें मंगवाई और पंडे को साथ लेकर भीमराज तथा प्रहलादजी चतुरानागाजी के पास गये । दर्शन करके दंडवत की और भेंट चढ़ाकर सामने बैठ गये । फिर अवसर देखकर भीमराज बोले— भगवन् मुझे दीक्षागुरु मंत्र देकर कृतार्थ करिये ।
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तब चतुरा- नागाजी ने भीमराजजी की ओर देखा और थोड़ी देर के लिये ध्यानस्थ हो गये । फिर ध्यान टूटने पर बोले— आपतो संत प्रवर दादूजी की आत्मा हैं, आपको मैं शिष्य नहीं बना सकता । दादूजी के पास जाकर उनके शिष्य बनो । भीमराजजी ने पूछा— दादूजी कौन हैं ? वे कहां मिलेंगे ? चतुरा- नागाजी ने कहा— वे सनक मुनि के अवतार हैं, परमेश्वर की आज्ञा से निर्गुणा ब्रह्म की भक्ति का विस्तार करने के लिये बालरूप धारण करके साबरमती नदी में बहते हुये अहमदाबाद के लोधीराम नागर ब्राह्मण को अहमदाबाद के पास मिले थे । उसी ने उनको पालापोषा था । अतः उसी के पौष्य पुत्र हैं ।
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वे अब करडाला ग्राम के पर्वत से सांभर आने वाले हैं । तुमको उनका दर्शन सांभर में ही होगा । सांभर आने पर तुम जाकर उनके शिष्य हो जाना । यह सब वृत्तान्त मैंने अभी ध्यान द्वारा जाना है और यह सब सत्य है । भक्तमाल में भी कहा है—
मू. छ.- परका¹ ले मिठाइ धरी जब आगे, सु नागे कहा सुन बातरे भाई ।
सांभर में प्रकटें सो गुरु कर, दादु के पाय परो तुम जाई ॥
मान प्रतीति चले अति आतुर, प्रान की प्रीति मिले सुखदाई ।
राघो कहै संत सुन्दरदास मिले, वर्ष दोस² हि में सुधि³ पाई ॥४९०॥
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¹वस्त्र ²दिन ³समाचार चतुरानागाजी से मिलने के पश्चात् एक वर्ष व्यतीत होने पर दादूजी के सांभर आने का समाचार मिला । दादूजी का परिचय प्राप्त होने पर भीमराज अति प्रसन्न हुये और भविष्य में होने वाले गुरुदेव की प्रतीक्षा करने लगे । अपने वस्त्रादि सब सामग्री सेवक को देकर उसे घर जाने की आज्ञा दी और स्वयं ने भगवां वस्त्र धारण कर लिये । भीमराजजी का ये सब व्यवहार देखकर प्रहलादजी को भी वैराग्य हो गया । उन्होंने पुनः घर जाने का विचार छोड़ दिया ।
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फिर मथुरा, वृन्दावन को त्याग कर दोनों महानुभाव सांभर आने के उद्देश्य से राजस्थान की ओर चल दिये । मार्ग में घाटड़ा ग्राम के पास इन्होंने पर्वत के पास ही बहती हुई नदी को और सुन्दर स्थान को देखकर संकल्प किया— यह स्थान भी बैठकर भजन करने के योग्य है । वहां से विचरते हुये विराट नगर को आये । वहां के पर्वत की एक गुफा में एक वर्ष तक भगवद् भजन करते हुये निवास किया । यहां ही किसी से दादूजी महाराज के कुछ पद सुने, उनपदों में प्रथम पद यह था-
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“सद्गुरु चरणां मस्तक धरणा, राम-राम कहु दुस्तर तिरणा । टेक ॥
अठ सिधि नव निधि सहजैं पावे, अमर अभय पद सुख में आवे ॥१॥
भक्ति मुक्ति वैकुंठा जाई, अमर लोक फल लेवे आई ॥२॥
परम पदारथ मंगल चार, साहिब के सब भरे भंडार ॥३॥
नूर तेज है जोति अपार, दादू राता सिरजन हार ॥४॥”
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इसका परिचय भक्तमाल में भी राघवदासजी महाराज ने दिया है, देखिये-
मू. छ.- “भगवां करि भेष रहे वर्ष एकहु, जैसे रहे मणिहीन भुजंगा ।
काहु ने आय पढ़े पद स्वामि के मानो सुमेरु से ऊतरि गंगा ॥
ज्यों धर से सनकादिक अंबर, ऐसे चले जैसे हंस विहंगा ।
राघो कहै संत सुन्दरदास जि, दादुदयालु के शोभित संगा ॥४९१॥”
पद सुनाने वाले सज्जन से दादूजी का पूरा पता मिल गया कि वे सांभर में ही हैं ।
(क्रमशः)

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