🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
.
४९. भ्रम विधवंस कौ अंग १/४
.
प्रतिमा* प्रीति हीनस्यं, प्रेम भगति न आश्रितं ।
कहि जगजीवन बिना रांमं, काष्ट धेनिजया घृतं* ॥१॥
(*-*. प्रेमभाव रहित काष्ट या पत्थर की प्रतिमा(मूर्ति) में प्रेमा भक्ति कर उस से परमार्थ(मोक्ष) प्राप्त करना तो ऐसी ही बात हुई कि जैसे कोई मूर्ख काष्ठ की बनी गौ को दुह कर उसके दूध से घृतप्राप्ति की आशा करता हो ॥१॥)
जिसका मूर्ति में प्रेम नहीं, जिसने सच्चे प्रेम और भक्ति का आश्रय नहीं लिया है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि बिना राम के उसका सारा जप-तप ऐसे ही व्यर्थ है, जैसे कोई लकड़ी की गाय से घी निकालना चाहे । लकड़ी की गाय दिखती तो गाय जैसी है पर उससे घी नहीं निकलता, वैसे ही बिना राम-प्रेम के सारी साधना निष्फल है ।
.
अस्म३ दार४ अवनी५ इष्ट, ए गुण ग्रहै अनेक ।
कहि जगजीवन रांम हरि. अलख लखै कोई एक ॥२॥
(३. अस्म=पत्थर) {४. दार=दादरु(काष्ठ)} (५. अवनि=पृथ्वी)
अस्म यानी पत्थर, दार यानी लकड़ी, और अवनी यानी मिट्टी - इनसे बनी मूर्तियों को ही लोग इष्ट मान बैठे हैं और अनेक गुणों को पकड़ कर बैठे हैं । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि असली इष्ट तो राम हरि हैं, जो अलख हैं - जो आँखों से दिखता नहीं । उस अलख को कोई विरला ही लख पाता है, देख पाता है ।
.
असम६ खसम जिनकी रसम६, तिन थैं अगम अगाध ।
कहि जगजीवन दरदवंद७, उस घर खेलै साध ॥३॥
(६-६. पत्थर की मूर्ति को ही अपना इष्ट देव मानना जिन की पूजा पद्धति हो) (७. दरदबंद=कष्ट झेलने वाली)
जिसका कोई शारीरिक आकार(असम) नहीं, जिसका कोई मालिक खसम) नहीं, जिसकी रस्म-दुनिया की रीत से अलग है, वही अगम और अगाध है - जिसे पाया नहीं जा सकता । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि जो दरदवंद है - जिसके हृदय में उस परमात्मा से मिलने की सच्ची पीड़ा है, वही साधु उस अगम घर में प्रवेश करके खेलता है, आनंद लेता है ।
.
अरम८ इष्ट ते अस्म नर, दार इष्ट ते दार ।
पंक इष्ट ते पंक अस्म८, रांम विमुख विभिचार ॥४॥
{८-८. पत्थर को पूजने वाले पत्थर ही हो जाते हैं । काष्ठ को पूजने वाले काष्ठतुल्य हो जाते हैं । पंक(गंगा की गीली रेती) से शिवलिंग बनाकर पूजने वाले कीचड़ के समान हो जाते हैं ।}
जो व्यक्ति पत्थर को इष्ट मानता है वह स्वयं पत्थर जैसा जड़ हो जाता है, जो लकड़ी को इष्ट मानता है वह लकड़ी जैसा हो जाता है, जो कीचड़(पंक) को इष्ट मानता है वह कीचड़ जैसा ही बन जाता है । अर्थात जैसा जिसका इष्ट वैसा ही उसका स्वरूप हो जाता है । संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि राम से विमुख होकर की गई हर पूजा व्यभिचार के समान है - भटकाव है, क्योंकि असली पति तो एक राम ही है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें