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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*धनि धनि साहिब तू बड़ा, कौन अनुपम रीत ।*
*सकल लोक सिर सांइयां, ह्वै कर रह्या अतीत ॥*
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*अचला गिरी पर पधारना*
द्वन्द्वपुरि से चलकर सुन्दरदासजी महाराज ने द्वन्द्वपुरी से दो मिल दूर तिलवाड़ा के पास पर्वत की चट्टान पर गुफा में कुछ समय ब्रह्म भजन किया था । इस गुफा के पास अब भी धूप की सुगंध आती रहती है । उक्त गुफा से विचरकर तिलवाड़ा से लगभग चार मील रामकुंड स्थान है । वहाँ जल का कुंड भरा रहता है और इस रामकुंड से जल का भरगा भी चलता रहता है । वहां गुफा भी है । उस गुफा में भी सुन्दरदासजी ने ब्रह्म भजन किया था ।
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इस गुफा में आगे एक खो आता है, वहां भी पानी वहता है । आज से लगभग ६० वर्ष पहले मांगू नामक एक गूजर एक संत के साथ आगे चला गया था । इससे उसने खो और पानी का नाला प्रत्यक्ष देखा था और उसी ने सवको सुनाया था । वहां के लोगों की धारणा है कि इस गुफा में जो दर्शन के योग्य होता है उसे सुन्दरदासजी का दर्शन होता है और कई भक्त सज्जनों को हुआ है । ऐसा वहां के निवासी वृद्ध लोग कहते हैं । इस स्थान से योगेश्वर संत सुन्दरदासजी हिमालय के अचला गिरी को पधार गये । कहा भी है-
“अचलागिरि वासो कियो, जपैं निरंजन जाप ।
अव भाषों जिन सुधि दिई, पद परसे रु मिलाप ॥२५॥ त.८ सुन्दरोदय
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अचला गिरि पर निवास की सूचना जिसने दी उसका परिचय दे रहे हैं- एक रामानन्दी वैष्णव साधु रसायन प्राप्ति की इच्छा लेकर १२ वर्ष से घूम रहा था । वह पर्वतों को खोजता हुआ उत्तर दिशा के पर्वतों में चला गया । वहां चारों ओर पर्वत ही पर्वत दृष्टि आ रहे थे । मनुष्य तो वहां दृष्टि में आता ही नहीं था । किन्तु एक दिन उन साधुजी ने अकस्मात एक योगी संत को देखा । तब उन्हें प्रसन्नता हुई । फिर वे योगी संतजी के पास गये और जय सीताराम बोलकर उनके चरणों में प्रणाम किया ।
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तब योगी संतजी ने इनसे पूछा— यहां कैसे आये हो ? साधुजी ने कहा— भगवन् ! मैं रसायन प्राप्ति की आशा से घूमता हुआ यहां आ गया हूँ । यह सुनकर योगी संत को उन साधुजी पर दया आ गई । इससे पास खड़ी हुई सिद्ध रसायन बूटी उनको बताई और साधु के शरीर पर उस बूंटी का रस मसला । उससे साधु का शरीर युवक के समान दिव्य हो गया । वृद्धावस्था चली गई । फिर योगी संत ने साधु को एक भस्म देते हुये कहा- इसको सदा पास में रखना, यह रसायन है । इससे ताम्र स्वर्ण हो जाता है । स्वर्ण बनाकर सद् उपयोग करना ।
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फिर उस योगी संत से उस साधु ने पूछा- भगवन् ! आप कौन हैं ? कहां रहते हैं ? आप कोई देवता हैं क्या ? मैं आपके चरणों में प्रणाम करके पूछता हूँ । आप सत्य-सत्य बताने की कृपा अवश्य करें । योगी संत ने कहा- मैं रामानन्दजी के पौत्र शिष्य और अनन्तानन्दजी के शिष्य कृष्णदासजी पयाहारी का शिष्य हूँ और उनके पास ही उनकी सेवा में रहता हूँ । योगी संत के उक्त वचन सुनकर साधु अति प्रसन्न होकर बोला- भगवन् ! मैं कृष्णदासजी पयाहारी की संप्रदाय का साधु हूँ । आप कृपा करके मुझे भी पयाहारीजी का दर्शन अवश्य करायें ।
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योगी संत ने कहा- तुम वहां चल नहीं सकते । साधु ने फिर बहुत दीनता पूर्वक प्रार्थना की तव योगी संत ने उसे अपने कंध पर बैठाकर आकाश मार्ग से थोड़ी ही देर में कृष्णादासजी पयाहारी की गुफा पर ले जाकर उतार दिया और कहा कि जो सामने शिला पर विराजे हुये हैं वे ही कृष्णादासजी पयाहारी हैं । साधु ने सप्रेम कृष्णादासजी पयाहारी को दंडवत किया और उनके चरणों की रज को अपने मस्तक पर धरा और अपने को कृतार्थ मानने लगा ।
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किन्तु कृष्णादासजी पयाहारी के माला तिलकादि न देखकर बोला— भगवन् ! आपके दिये हुये माला तिलकादिक हम धारण करते हैं किन्तु आपके तो वे नहीं दिखाई दे रहे हैं और न यहां ठाकुरजी की मूर्ति ही है, यह क्या बात है ? आपके ये सब होने ही चाहिये । साधु का उक्त वचन सुनकर कृष्णादासजी पयाहारी ने कहा- अब हम आन्तर साधना करते हैं । उक्त चिन्हों की आवश्यकता नहीं रही ।
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हमारे परम गुरुदेव रामानन्दजी महाराज ने भी मानस पूजा का उपदेश दिया है । माला जप की संख्या करने के लिये रक्खी जाती है । अब हम जप संख्या नहीं करते निरंतर ही जप करते हैं । तिलक संप्रदाय का चिन्ह है किन्तु अब हम संप्रदायवाद से ऊपर उठ गये हैं । अतः गुरु उपदेश ही शिर पर धारण करते हैं, वही हमारा तिलक है, शरीर ही मंदिर है इसमें आत्म-स्वरूप ठाकुरजी विद्यमान हैं उनकी पूजा निरंतर करते हैं । इससे बाह्य मूर्ति-पूजा की आवश्यकता अब हमारे को नहीं रही है । उच्चकोटि के संतों को उक्त चिन्हों की आवश्यकता नहीं रहती है ।
(क्रमशः)

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