🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४८. सतगुरु कौ अंग ४/६*
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रांम नांम गुरु बचनं, स्नानं देह पवित्र कृतं ।
हरि रस अम्रित नीरं, जगजीवन समुद्र घृतं ॥४॥
राम नाम ही गुरु का वचन है, उसके स्मरण रूपी स्नान से देह पवित्र हो जाती है । हरि रस ही अमृत जल है, संत जगजीवनदास जी कहते हैं, वही समुद्र की तरह सब जगह भरा है ।
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रांम नांम सुरति मुरत्यं, सु सबद उच्रितं तनं ।
कहि जगजीवन तस्य वचनं, सतगुरु रीझै तज्जनं ॥५॥
राम नाम में ही सुरति और मूर्ति दोनों हैं, और वही सुंदर शब्द तन में गूंजता है । संत जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं, ऐसे वचन सुनकर सतगुरु अपने जन पर रीझ जाते हैं ।
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रांम नांम प्रसाद सौं, त्रिपति१ पंच भू एह ।
कहि जगजीवन प्रेम रस, सतगुरु पोषी२ देह ॥६॥
{१. त्रिपति-तृप्ति(सन्तोष)} (२. पोषी-पाली गयी)
राम नाम के प्रसाद से ही पाँच तत्वों से बनी यह देह तृप्त होती है । जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं, सतगुरु ने प्रेम रस से इस देह का पोषण किया है ।
(क्रमशः)

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