शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~१७/२०*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~१७/२०*
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*ऊपर संत असंत सम, अंतरि अंतर होय ।*
*रज्जब पाणी ईख का, रूप एक रस दोय ॥१७॥*
जैसे जल और ईख के रस का रूप समान सा दिखाई देते हैं, किन्तु पान करने पर दोनों के रस ज्ञात होंगे, वैसे ही ऊपर के भेषादि से तो संत और असंत समान दिखाई देते हैं, किन्तु भीतर अन्तकरण के भावों को देखने पर बहुत भेद ज्ञात होता है ।
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*साधु मिश्री मधुर मत, फोकट१ फटक२ पषान ।*
*जन रज्जब रंग एक से, चाख्यों भिन्न विनान३ ॥१८॥*
मिश्री और स्फटिक२ पत्थर का रंग एक सा दिखाई देता है, किन्तु चखने से उनके भिन्नत्व का ज्ञान३ होगा, अर्थात मिश्री मधुर और स्फटिक निरस१ ज्ञात होगा, वैसे ही साधु और असाधु भेषादि से एक से दिखाई देते हैं, किन्तु प्रसंग पड़ने पर उनके भिन्न मत दिखाई देंगे, उनमें साधु का सर्वप्रिय और असाधु का विक्षेप-प्रद सिद्ध होगा ।
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*साधु पारस परम निधि, और शिला संसार१ ।*
*जन रज्जब वपु एक से, गुण गति२ भिन्न विचार ॥१९॥*
साधु तो परम धन पारस के समान है और असाधु१ साधारण शिला के समान हैं, पारस और शिला दोनों पत्थर होने से आकार में सामान हैं, वैसे ही साधु और असाधु के शरीर समान हैं, किन्तु उनके गुणों का स्वरूप२ विचारा जाय, तो पारस-शिला और साधु-असाधु भिन्न भिन्न ही सिद्ध होते हैं ।
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*साधु कोयल काग जग, दर्श एक उनमान ।*
*जन रज्जब बोले विगति१, अरु खान पान पहचान ॥२०॥*
कोयल और काक दोनों के रंग देखने से तो अनुमान होता है कि दोनों ही एक जाति के पक्षी होंगे, किन्तु उनकी आवाज, विशेष प्रकार की गति१, खान पानादि से ही उनकी पहचान होती है, वैसे ही संत असंत भी समान ही दिखते हैं, किन्तु उनके वचन, विशेष भाव१ विचार और खान पानादि व्यवहार से ही उनकी पहचान होती है ।
(क्रमशः)

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