🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
*अन्तर सोई नीका जाणै,*
*निमिष न बिसरै ब्रह्म बखाणै ॥*
*सोई सुजाण सुधा रस पीवै,*
*दादू देखि जुग जुग जीवै ॥*
================
एक समय अर्थ की न्यूनता से देवादास जी के गुरु भाई महन्त लच्छीराम जी चिन्तित थे । उनके मन की स्थिति जानकर देवादासजी ने महन्त जी को कहा- महन्तजी चिन्ता क्यों करते हो आप जितना भी खरीद सको उतना ही जीरा खरीद लो, उससे आपकी सब चिन्ता मिट जायगी । महन्त लच्छीरामजी तो जानते ही थे कि देवादासजी सिद्ध पुरुष हैं । इनकी वाणी यथार्थ ही होती है । अतः उन्होंने अपनी शक्ति भर जीरा खरीद लिया । फिर उस वर्ष जीरा बहुत महंगा हो गया था । इससे एक ही वर्ष में महन्त लच्छीरामजी की चिन्ता नष्ट हो गई थी । कहा भी है-
"जान लेते हैं भविष्य भी, योगीजन अन्यास ।
देवादास ने महन्त की, सहज मिटाई त्रास ॥ह.त. १०॥
.
देवादासजी आगामी बात पहले ही जान जाते थे यह अति प्रसिद्ध है । जब कोई संतों की मंडली आने वाली होती थी तो देवादासजी को ज्ञात हो जाता था कि अमुक मंडलेश्वर की मंडली आ रही है । तब वे महन्त जी के पास जा कर कहते- महन्त जी गेहूं दे दो । गेहूं खाने वाले महात्माओं की मंडली आ रही है जिससे पहले ही पीस कर आटा तैयार कर दिया जाय । महन्तजी दे देते थे कारण वे जानते थे कि इनको पहले ही पता लग जाता है संतोंकी सेवा करने से ही देवादासजी की दिव्य दृष्टि हो गई थी । कहा भी है-
"साधु सेवसे होत है, दिव्य दृष्टि सत बात ।
नाभा देव दास अरु, सन्त भक्त की ख्यात ॥३३०॥ह.त. ७॥
.
देवादासजी जब गेहूं व जौ पीसते थे तब जिस मकान में पीसते थे उसका किवाड़ बन्द कर लेते थे । एक दिन किवाड़ बन्द करना भूल गये । द्वार खुला होने से एक संत उनके पास चले गये तो उन्होंने देखा देवादासजी तो ध्यानस्थ हैं और चक्की अपने आप ही फिर रही है । यह आश्चर्य देखकर संत महन्त जी के पास गये और महन्तजी से बोले- महाराज ! देवादासजी की पीसने की कुटिया खुली देखकर मैं उसमें गया तो मैंने देखा- देवादासजी तो चक्की से दूर बैठे हुये ध्यान में निमग्न हैं और चक्की अपने आप ही फिर रही है । तथा अपने आप उसमें गेहूं पड़ रहे हैं ।
.
तब महन्त लच्छीरामजी ने स्वयं ही जाकर देखा तो वास्तव में ही चक्की अपने आप घूम रही है और आवश्यकतानुसार गाला(अन्न के दाने) भी अपने आप ही चक्की में पड़ते जाते हैं तथा सिद्ध संत देवादासजी दूर बैठे ध्यान कर रहे हैं । फिर महन्तजी ने उनका पीसना छुड़ा दिया । देवादासजी भिक्षा लेने जाते थे । वे एक दिन अपने काकी के घर भिक्षा लेने गये थे । देवादासजी को आया हुआ देखकर काकी ने कहा - नाज तो थोड़ा हुआ है और बोहरा अधिक मांगता है । बोहरा जितना मांगता है, उतना बोहरा को तोल दें तो खाने के लिये भी नहीं बचेगा ।
.
यह सुनकर देवादासजी ने कहा- तू बोहरा को पूरा तोल दे, तेरे खाने के लिये रह जायगा । फिर उसने बोहरा को बुलवाकर वह जितना मांगता था उतना सब तोल दिया और अपने घर के खाने के लिये जितना १२ मास में चाहिये था वह भी सब अपनी मिट्टी की कोठली आदि सब भर गये किन्तु फिर भी वह अन्न राशि कम नहीं हुई उतनी की उतनी ही रही । तब काकी दौड़कर प्रहलादशाल पर आकर देवादास जी को बोली- देवला ! मैंने बोहरे को भी चुका दिया और १२ महिने घर में खाने के लिये भी बहुत रख लिया है किन्तु तो भी नाज की राशि कम नहीं होती है ।
.
काकी की उक्त बात सुनकर देवादासजी बोले- उस अन्न राशि पर ऊंधा टोकरा लगा दे । फिर उसने उस अन्न पर ऊंधा टोकरा रख दिया और कुछ देर के पश्चात् उठा कर देखा तो एक दाना भी नहीं मिला । इससे सूचित होता है कि देवादासजी की आज्ञा में ऋद्धि सिद्धि भी रहती थीं किन्तु देवादासजी अपने लिये उनका कुछ भी उपयोग नहीं करते थे । देवादासजी तमाखू का डांड अपनी डाह में रखा करते थे । इससे वे तमाखू का डांड मांगा करते थे । एक दिन अपने पूर्वाश्रम के घर की बाई से उन्होंने तमाखू का डांड मांगा । बाई ने तत्काल लाकर दे दिया ।
.
उससे प्रसन्न होकर देवादासजी ने कहा - बाई तेरे नवें महीने बेटा होगा । यह सुनकर बाई घबराई और बोली - बाबाजी ! मैं तो विधवा हूँ, मेरे लिये तो यह महा दुःख की बात है । देवादासजी ने कहा - बाई ! अब तो मेरे मुख से निकल गया, बेटा तो होगा ही । जब उसके गर्भ चिन्ह प्रकट हुए तब जाति वालों ने पंचायत की और उससे पूछा । तब वह संकट में पड़ गई किसका नाम बतावे ।
.
देवादासजी को ज्ञात हुआ तो वे पंचायत की सभा में जाकर बोले - इस बाई का कोई दोष नहीं, यह तो मेरे राम के मुख से तेरे बेटा होगा यह निकल गया था । अतः इसे आप लोग जाति बाहर मत करो । देवादासजी को सब जानते ही थे कि ये सिद्ध पुरुष हैं इनके मुख से निकलने पर तो बात सत्य ही होती है । अतः उस बाई को जाति बाहर नहीं निकाला । इससे सूचित होता है कि देवादासजी का प्रभाव जनता पर अत्यधिक था ।
.
एक दिन देवादासजी महन्तजी की घोड़ी को वन में छोड़ने को गये थे । वे उसे छोड़कर आये ही थे कि थोड़ी देर में घोड़ी स्थान पर पीछे आ गई । तब महन्तजी ने कहा - देवादासजी ! घोड़ी तो पीछे आ गई । इसको आगे छोड़कर आओ जिससे पीछे नहीं आवे । देवादासजी बोले - पीछे नहीं आवे ऐसे छोड़ आऊं क्या ? महन्तजी ने कहा - हां, ऐसे ही छोड़ आओ । फिर देवादासजी घोड़ी को छोड़कर आ गये । उस दिन घोड़ी लौटकर नहीं आई । उसे सिंह खा गया ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें