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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ३३/३६*
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*ए व्रत संजम ए क्रिया, ए सुच्या९ ए ग्यांन ।*
*जगजीवन निज निरखिये, अंतर गति धरि ध्यांन ॥३३॥*
{९ सुच्या=शुचि(तन मन की शुद्धि)}
संत जगजीवनदास जी कहते हैं, ये बाहरी व्रत, संयम, तरह-तरह की क्रियाएँ, तन-मन की शुचि और किताबी ज्ञान ये सब तभी सार्थक हैं, जब अपने निज स्वरूप को भीतर देखो । अंतर की गति में ध्यान धर के अपने आप को निरखो । बाहर का सब दिखावा भीतर के दर्शन के बिना व्यर्थ है ।
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*एक दस एकादसी, ए व्रत उत्तम सार ।*
*जगजीवन दूजी करै, सोई मूढ़ गंवार ॥३४॥*
वो जो एक में परमात्मा में दशा लग जाने वाली एकादशी है, वही व्रतों में सबसे उत्तम और सार है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं, जो इस एक अनन्य व्रत को छोड़ कर दूसरी-दूसरी एकादशी केवल भूखे रहने वाली करता फिरता है, वो मूढ़ और गँवार ही है ।
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*जगजीवन निज निरजला, भजतां निरमल नांम ।*
*साधन१ का सांचा वरत, दुनियां का बेकांम ॥३५॥*
{१. साधन का=साधु सन्तों का}
संत जगजीवनदास जी कहते हैं, हमारा अपना सच्चा निरजला व्रत यही है कि निरमल नाम राम नाम को भजते रहें । साधु-संतों का यही सच्चा व्रत है । दुनिया के कहने के लिए किया गया भूखा रहने वाला व्रत तो बेकाम-बेकार है ।
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*कहि जगजीवन गया२ की, संगति गया बिलाइ ।*
*पिंड भरण तीरथ गया, रह्या न हरि गुन गाइ ॥३६॥*
(२. गया की=गया तीर्थ जाने वाले की)
संत जगजीवनदास जी चेताते हैं - जो व्यक्ति गया तीर्थ जाकर पिंड भरने के चक्कर में पड़ गया, वो सत्संगति से गया-बिलाया, अर्थात सत्संग से चूक गया, खो गया । वो गया तो पिंड भरने तीर्थ को, पर हरि के गुण गाना ही छोड़ बैठा । तीर्थ से बड़ा तो हरि का गुणगान है ।
(क्रमशः)

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