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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४८. सतगुरु कौ अंग १०/१३*
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सतगुरु साषी सौ कही, सकल ग्रंथ जा मांहि ।
कहि जगजीवन रांमजी, दूजा भावै४ नांहि ॥१०॥
(४. भावै=रुचिकर)
सतगुरु ने साखी के द्वारा जो कहा, वह सब ग्रंथों में है । संत जगजीवनजी कहते हैं, हे रामजी, मुझे और दूसरा कुछ भी अच्छा नहीं लगता ।
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सतगुर साखी सौ कही, रही सकल घट छाइ ।
कहि जगजीवन सुनत हरि, मिटि गइ चित की चाहि ॥११॥
सतगुरु ने जो साखी कही, वह हम सब जीवों में छाई हुई है । संत जगजीवनदासजी कहते हैं, हरि को सुनते ही चित्त की सारी चाह मिट गई ।
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सतगुर साषी सौ कही, भाखी दास कबीर ।
कहि जगजीवन करि रहे, गुरु दादू तहं सीर१ ॥१२॥
(१. सीर=मेल)
सतगुरु की साखी कबीर दास ने भी कही, और उसी में गुरु दादू ने मेल मिलाया । एवं वे उसी में लीन होकर रह रहे हैं यह बात जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं ।
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सतगुर साखी सौ कही, जे भाई सब साध ।
कहि जगजीवन बिचारै, बांणी अगम अगाध ॥१३॥
सतगुरु की साखी जो कही, वह सब साधुओं को अच्छी लगी । संत जगजीवन कहते हैं, वे इस अगम और अगाध वाणी का विचार करते हैं ।
(२. भाई=अच्छी लगी ।)
इति सतगुरु कौ अंग संपूर्ण ॥४८॥
(क्रमशः)

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