🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
.
*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग २१/२४*
.
*कंचन की सरभरी८ तुलै, पुनि करै कुरु छेत्र ।*
*कहि जगजीवन भोग भ्रम, हरि मंहि खुलै न नेत्र ॥२१॥*
(८. कंचन की सरभरी=सोने के बराबर)
कोई व्यक्ति सोने की मेरु पर्वत जैसी बड़ी ढेरी को तराजू पर तोल कर दान कर दे, और उसके बाद कुरुक्षेत्र जैसे महातीर्थ में जाकर भी दान-पुण्य करे, तो भी उससे मुक्ति नहीं मिलती । जगजीवन साहेब कहते हैं कि यह सब केवल भोग की इच्छा और भ्रम ही है, इससे हरि में प्रेम के नेत्र नहीं खुलते । सच्चा लाभ तो तब है जब मन हरि में लगे, केवल सोना दान करने से भगवान नहीं मिलते ॥२१॥
.
*गंग गया गोदावरी, कटै न तन का मैल ।*
*कहि जगजीवन जग धरम९, ज्यूं तेली का बैल ॥२२॥*
(९. जग धरम=जगत का दैनिक कर्म)
गंगा, गया, गोदावरी जैसे पवित्र तीर्थों में बार-बार नहाने से शरीर का मैल भी पूरी तरह नहीं कटता, तो मन का मैल कैसे कटेगा । जगजीवन जी कहते हैं कि बिना प्रेम के जो जगत का धर्म यानी केवल बाहरी तीर्थ-व्रत किया जाता है, वह तेली के बैल जैसा है । बैल आँख पर पट्टी बाँध कर दिन भर कोल्हू के चारों ओर घूमता है, पर वहीं का वहीं रहता है, आगे नहीं बढ़ता । वैसे ही जीव भी तीर्थों में घूमता रहता है पर माया से बाहर नहीं निकलता ॥२२॥
.
*तीरथ व्रत करि करि मुए, सेवा पूजा पाक ।*
*जगजीवन जग का धरम, ज्यूं कुलाल का चाक ॥२३॥*
अनेक लोग तीर्थ, व्रत, सेवा, पूजा, पवित्र भोजन और नियम आदि करते-करते ही मर गए, पर भीतर की मुक्ति नहीं मिली । जगजीवन जी कहते हैं कि संसार का यह केवल बाहरी धर्म कुम्हार के चाक जैसा है । चाक लगातार घूमता ही रहता है, कभी स्थिर नहीं होता, और उसी पर बर्तन बनते-बिगड़ते रहते हैं । वैसे ही जीव भी इन बाहरी कर्मों के चक्कर में जन्म-मरण के चक्कर में ही घूमता रहता है ॥२३॥
.
*बदरी फिरि केदार फिरि, जगन्नाथ फिरि जोइ ।*
*गंगा सागर द्वारिका, सब तीरथ गमि१ होइ ॥२४॥*
{१. गमि=गति(जाना)}
चाहे तुम बदरीनाथ फिर आओ, केदारनाथ फिर आओ, जगन्नाथ पुरी, गंगा सागर और द्वारिका, सारे तीर्थ घूम लो, तो भी मन को कहीं सच्चा ठिकाना नहीं मिलता । सब तीर्थ घूम लेने पर भी अगर भीतर हरि से प्रेम नहीं जगा, तो मन भटकता ही रहता है । बाहर की यात्रा से पैर थकते हैं, मन शांत नहीं होता, शांति तो भीतर के तीर्थ में मिलती है ॥२४॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें