शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

प्रहलादजी ब्रह्म स्वरूप में

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*सब चतुराई देखिये, जे कुछ कीजे आन ।*
*मन गह राखै एक सौं, दादू साधु सुजान ॥*
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निरंतर निदिध्यासन रूप रटन करके प्रहलादजी ब्रह्म स्वरूप में ही प्रवेश कर गये थे ।
परम पुरुष प्रहलाद के, इतने शिष्य सब धर्म धुर¹ ॥
तिन मधि बड़ बानैत हेत² हापोजी होई ।
धीरध और अनन्त, बुरो जनि मानो कोई ॥
चरणदास भजनीक, तिलकधारी है केशो ।
हरीदास पुनि पाट, कियो हरि घर सु प्रवेशो ॥
कान्हड़दास कल्यारा, पुन. परमानन्द धमंडी ।
रामदास हरदास, भक्त भगवद्द की मंडी³ ।
राघव को रुचि रात दिन, भर्यौ भक्त भगवंत गुरु ॥
परम पुरुष प्रहलाद के, इतने शिष्य सब धर्म धुर ॥६६२॥
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परम पुरुष प्रहलादजी के, इतने शिष्य भागवद्द धर्म रूप रथ की धुरी¹ को धारण करने वाले थे । उनमें प्रेमाभक्ति² रूप बाण चलाने वाले बानैत और महान १- हापाजी ही थे । इस बात से कोई बुरा न मानें और भी अनन्त बड़े थे । २- भजनीक चरणदासजी और ३- तिलकधारी केशवजी । गद्दी पर हरिदासजी ही बिराजे थे और उन्होंने हरिधाम(स्वरूप) में ही प्रवेश किया था ।
(उक्त छंद के "तिन मधि से प्रवेशो" तक के चार पादों ने समाज में विवाद खड़ा कर रखा है । इनमें यह कह कर कि- सबसे बड़े हापाजी थे, फिर कहते हैं कि कोई मेरी इस बात पर बुरा नहीं मानें, और भी अनन्त बड़े थे अर्थात् हरिदासजी से बहुत बड़े थे । चरणदासजी भजन करने में बहुत बड़े थे । और केशवदासजी तिलक गुरु गादीधारी होने से बहुत बड़े थे । फिर भी हरिदासजी पाट अर्थात् गद्दी धारण करते थे अर्थात् उनकी स्वयं की गद्दी हिन्डौन में लगती थी और उन्होंने हरिस्वरूप में प्रवेश किया था इससे बड़े थे । राघवदासजी हरिदासजी के शिष्य थे अतः अपने गुरुदेव की महिमा करना भी उनका कर्तव्य था ही । किन्तु उनका तात्पर्य पाटड़ा गद्दी पर वे बिराजे थे ऐसा मानले तो पाटड़ा की गद्दी के महन्तों में हरिदासजी का नाम आना चाहिये सो तो आता नहीं, केशवदासजी का ही आता है । "हरिदास पुनि पाट" यह राघवदास जी का पाद भी यही ध्वनि करता है कि- प्रहलाददासजी की गद्दी पर तो केशवदास ही बैठे थे फिर भी हरिदासजी गद्दी पर ही बिराजते थे । ऐसा मान लेने पर संगति बैठ जाती है । कारण वे हिन्डौन में गद्दी पर ही विराजते थे । हिन्डौन उनकी स्वयं की गादी थी ही । उक्त पदों के प्रयोग से मुझे तो ऐसा ही ज्ञात हो रहा है । वास्तविकता क्या है, यह तो भगवान् ही जाने)
४- कान्हड़दासजी ५- कल्यारादासजी ६- परमानन्दजी ७- धमंडीजी ८- रामदासजी कहीं कहीं "धमंडी रामू" भी पाठ मिलता है । अतः धमंडी रामदास का विशेषण भी हो सकता है । ९- हरदासजी । इन सब ने ही भगवान् की भक्ति की³ थी । राघवदासजी कहते हैं- मेरे हृदय में रात दिन यही रुचि रहती है कि भक्त, भगवान् और गुरु का यश कहता ही रहूँ ।
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दो माधव दो सूर, दो नारायण नापो ।
चतुरदास दो सन्त, नहीं जिनके अंग आपो ॥
श्यामदास चरणदास, मतो नरहरि को न्यारो ।
किशनो मोहन मान, रामजी सबको प्यारो ॥
भाषा में भौरे नहीं, राघव ज्यों की त्यों कही ।
परम पुरुष प्रहलाद की, पैज प्रकट पंथ सु रहो ॥६६३॥
उक्त सभी प्रहलादजी के शिष्यों में देहाभिमान नहीं रहा था और सबको ही रामजी प्रिय लगते थे । राघवदासजी कहते हैं- यह मैंने भूल में नहीं कहा है, जैसा था वैसा ही कहा है । दादू पंथ में प्रहलादजी की श्रेष्ठता की टेक अच्छी प्रकार रही थी अर्थात् दादूपंथ में वे महान् माने जाते हैं ।
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*प्रहलादजी के सेवक शिष्य*
ये स्वामी प्रहलाद के, राघव सेवक शिष्य बरणि ॥
सेवक बडव कुरेत, प्रथम धीरावत सारे ।
खान पान से रहित, नाम तिनके निरवारे¹ ॥
भरतोजी बड़ भक्त, छओं दर्शन में जारां ।
वेणीदास बखान, भावे आदर अन्त पारगौ² ॥
रामसाहि धन धर्म, धुर³ गुरु आज्ञा अंत बणी ।
भई भक्ति गोविन्ददास, कुल दीपक कीरति घणि ॥
भांझू भक्ति जुंभारखां, देवकरण हरि की शरणि ।
ये स्वामी प्रहलाद के, राघव सेवक शिष बरणि ॥६६४॥
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प्रथम बड़े कुरेत(कुरीति वाले) थे । वे सब घाटड़ा के धीरावत आपके सेवक बन गये थे । मांस मदिरा का खान पान छोड़ दिया था । फिर तो वे मांसादि के नाम उच्चारण करने से भी छूट गये¹ थे । घाटड़ा के धीरावतों में भरतजी बड़े भक्त थे । उनको छःओं दर्शन- (योगी, जंगम, सेवड़े, बौद्ध, सन्यासी, शेष) ये छः प्रकार के भेषधारी सब जानते थे । वेणीदासजी भी कथन करने योग्य हो गये हैं । वे आये अतिथियों का अति आदर करते थे और प्रेम से अन्न जल² देते थे ।
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रामसाहजी ने तो अपना धन धर्म में ही लगाया था और अंत³ तक गुरु आज्ञा का पालन किया था । उनकी अन्त में अच्छी स्थिति बन गई थी । गोविन्ददासजी भी भक्ति की अच्छी अवस्था को प्राप्त हो गये थे । ये भी कुल दीपक माने जाते थे । इनकी कीर्ति भी बहुत फैल गई थी । झांझूजी जुंझारखांजी और देवकरणजी ये सब भक्ति करके हरि की शरण में आ गये थे । उक्त प्रकार प्रहलाददासजी के सेवक शिष्य भी अच्छे भक्त हुए हैं । यह भक्तमालकार ने आंखों देखी ही बातें लिखी हैं ।
(क्रमशः) 

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