*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~१३/१६*
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*स्वामी कर१ सेवक बड़े, नाँहीं अचरज कोय ।*
*रज्जब तरु फल शिश पर, प्रत्यक्ष देखो जोय२ ॥१३॥*
स्वामी के द्वारा१ ही सेवक बड़ा बनता है, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, सेवक का जो२ बड़प्पन है वह प्रत्यक्ष है, देखो वृक्ष का फल वृक्ष के शिर पर ही रहता है ।
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*भगवन्त भूमि ऊपर दर्शै, वन्दे वृक्ष सु१ भाल२ ।*
*सो रज्जब परमारथी, सब प्राणिहुं प्रतिपाल ॥१४॥*
जैसे वृक्ष पृथ्वी से उत्पन्न होकर भी पृथ्वी के शिर२ पर दिखाई देते हैं, वैसे ही भगवान की भक्ति द्वारा संत बन कर भी श्रेष्ठ१ संत भगवान के शिर पर दिखाई देते हैं, इस बड़प्पन का कारण यह है कि - वे वृक्ष तथा संत दोनों ही सभी प्राणियों के प्रतिपालक और परमार्थी हैं ।
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*सांई शून्य समान है, वन्दे१ बादल जूंणि२ ।*
*तिन माँहीं ह्वै दे प्रभू, चौरासी की चूंणि३ ॥१५॥*
परमात्मा आकाश के समान हैं और संत१ बादल के समान हैं, जैसे आकाश बादलों द्वारा वर्षा करके चौरासी लक्ष योनियों२ को चून३(भोजन) देने में निमित होता है, वैसे ही प्रभु उन संतों द्वारा ही सबको सुख शांती देते हैं ।
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*आदम१ माँहीं ऊपजे, शब्द स२ विता३ सो शीश४ ।*
*रज्जब रीझ्या देखकर, त्योंही जन जगदीश ॥१६॥*
जैसे मनुष्य१ में विचार-धन३-सहित२ शब्द उत्पन्न होता है, वही शिरोमणि४ माना जाता है, उसी से मानव आनन्दित होता है, वैसे ही संसार में जो संत उत्पन्न होता है, उसे ही देखकर जगदीश्वर प्रसन्न होते हैं ।
(क्रमशः)

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