सोमवार, 19 अक्टूबर 2026

*२९. साधु महिमा का अंग ~१७/२०*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~१७/२०*
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*साधों के हित सृष्टि यहु, सिरजी सिरजनहार ।*
*यथा पिता पुत्रहु निमित्त, श्रम१ करहिं संसार ॥१७॥*
संसार में जैसे पिता पुत्र के लिये परिश्रम१ करता है, वैसे ही सृष्टिकर्त्ता ईश्वर ने यह सृष्टि संतों के लिये ही रची है, सृष्टि बिना संत सेवा कैसे होती ?
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*खलक१ मुलक२ खेती करी, खालिक३ खसम सु साथ ।*
*ता में कण जण नीपजे, हरि हाली के हाथ ॥१८॥*
संसार१ रूप देश२ अर्थात खेत में साधन रूप खेती करी है, संसार का कर्त्ता३ स्वामी ब्रह्म भी व्यापक होने से तथा प्रतिक्षण चिन्तन होने से साथी ही है, जैसे खेत में हाली के हाथ से अन्नकण उत्पन्न होकर प्राणियों के पोषक होते हैं, वैसे ही हरि के कृपा-रूप से संसार में संत उत्पन्न होकर संसार को सुखद होते हैं ।
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*भजन भूमि जन कन उदय, समा१ धणी२ के होय ।*
*यहु खेती सुखदाय की, बूझे विरला होय ॥१९॥*
भूमि में अन्न कण उत्पन्न होते है तब भूमि के स्वामी२ के लिये अच्छा समय१ होता है, वैसे ही भजन से संत उत्पन्न होते हैं तब वह समय प्रभु को प्रिय होता है, भजन - भूमी में उत्पन्न होने वाली संत-रूप खेती महान् सुखप्रद होती है, किन्तु उस सुख को कोई विरला ही समझ पाता है ।
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*भक्त भेंट भगवन्त है, जे कुछ हरि घर माँहिं ।*
*परि बन्दा१ पैठा बन्दगी, सु कछू कबूले२ नाँहिं ॥२०॥*
जो भी कुछ हरि के घर में है, वह सभी कुछ भगवान संत को भेंट रूप में देने को तैयार हैं, किन्तु संत१ तो भगवान की भक्ति में स्थित है अन्य कुछ स्वीकार२ नहीं करता ।
(क्रमशः)

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