मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग २९/३२*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग २९/३२*
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*जलमइ५ सकल सरीर ये, जल ही मांही बास ।*
*कहि क्यों रहिये निरजला, सु कहि जगजीवनदास ॥२९॥*
{५. जलमइ=जलमय(जलयुक्त)} 
संत कहते हैं कि यह हमारा सारा शरीर ही जल से बना है । खून, पसीना, रस सब जल ही है । और हमारा वास भी जल में ही है - माता के गर्भ में हम जल में ही रहे । फिर हे साधक ! तू बाहर से पानी न पीने का दिखावा करके कैसे निरजला रह लेगा ? शरीर का धर्म तो जल से ही है । असली निरजला तो मन का होना चाहिए ।
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*एक जला इक निरजला, सरवर६ मद्धि निवास ।*
*क्यूं व्रत निबहै क्यों रहै, सु कहि जगजीवनदास ॥३०॥*
{६. सरवर=सरोवर(तालाब)}
जैसे एक ही तालाब में दो पक्षी रहते हैं - एक जल में डुबकी लगाता है(जला) और एक किनारे बैठा पानी से दूर रहता है(निरजला) । वैसे ही इस संसार रूपी सरोवर में दो तरह के साधक हैं । एक तो संसार के भोग रूपी जल को पीता है, दूसरा कहता है मैं निरजला व्रत हूँ । पर दोनों रहते तो इसी सरोवर में ही हैं । जगजीवनदास जी पूछते हैं - जब रहना यहीं है तो तेरा ये बाहरी व्रत कैसे निभेगा ? मन तो अभी यहीं अटका है ।
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*हरिजल पीवत निरजला, जे व्रत धारै कोइ ।*
*कहि जगजीवन तहँ, पलटि देवगति होइ ॥३१॥*
सच्चा निरजला व्रत वो है । जो व्यक्ति हरि नाम रूपी जल को पीता है, हरि के प्रेम रस को पीता है, और संसार के जल से - काम, क्रोध, लोभ से - निरजला रहता है । जो ऐसा व्रत धारण करता है, जगजीवनदास जी कहते हैं, उसकी पलट कर देवगति हो जाती है, अर्थात वो मनुष्य से देवता के समान पवित्र हो जाता है ।
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*एक दसा७ एकादसी८, के करि जांणैं कोइ ।*
*जगजीवन सौ पलटि करि, जीव ब्रह्म तहां होइ ॥३२॥*
{७. एक दसा=एक अनन्या(प्रेमा) भक्ति की अवस्था में}
(८. एकादसी=निर्जला एकादशी व्रत)
एकदशा माने एक अवस्था - जब मन एक ही परमात्मा में टिक जाए, अनन्य प्रेम की दशा बन जाए । यही सच्ची एकादशी है । इस भेद को कोई बिरला ही जानता है । जगजीवनदास जी कहते हैं, जो इस एकदशा में पलट कर - अर्थात संसार से उलट कर भीतर मुड़ जाता है, वहीं जीव ही ब्रह्म हो जाता है ।
(क्रमशः)

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