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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*कोई नहिं करतार बिन, प्राण उधारणहार ।*
*जियरा दुखिया राम बिन, दादू इहि संसार ॥*
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*हरिचरणजी का सम्मान*
घाटड़ा के महन्त हरिचरणजी को वि. सं. १९०९ के दादूद्वारा नारायणा के मेले में आचार्य नारायणदासजी महाराज ने जमात के पंचों के आग्रह से भेंट लेकर छड़ी रखने का अधिकार दिया था तथा जमातों के ११ अखाड़ों के महन्तों के समान ही घाटड़ा के महन्तों का सम्मान करना नियत किया था ।
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*हरिचरणजी के शिष्य*
महन्त हरिचरणदासजी घाटड़ा वालों के १९ शिष्य थे- देवादासजी, दोलजी, लच्छीरामजी आदि । दोलजी विरक्त हो गये थे । गिरधारीदासजी दूबल धनियां की मंडली में रहते थे । मंडलेश्वर जुगतरामजी के संरक्षक दोलजी ही थे । लच्छीरामजी हरिचरणजी की गद्दी पर विराजकर घाटड़ा के महन्त बने थे ।
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*सिद्ध संत देवादासजी*
महन्त हरिचरणदासजी घाटड़ा वालों के शिष्यों में देवादासजी महान् सिद्ध पुरुष हुये हैं । देवादासजी का जन्म घाटड़ा के ही कुंभावत कुल में हुआ था । जब वे बोलने लगे तब "अब बाबा के पग जाबा" यही सब दिन भर बोलते रहते थे । तब उनके घरवालों ने सोचा कि- यह बालक हर समय "अब बाबा के पग जाबा" ही बोलता रहता है, और इसकी चेष्टा भी अन्य बालकों से निराली ही है और महात्माओं की सी चेष्टा करता है । अतः हो सकता है, प्रारब्धवश किसी महात्मा ने ही हमारे कुल में जन्म लिया हो । इसलिये इसे महात्मा के ही भेंट कर देना चाहिये ।
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फिर घरवालों ने अपने देवला नामक उस बालक को घाटड़ा के महन्त हरिचरणजी को भेंट कर दिया । महन्त हरिचरणजी ने देवला को अपना शिष्य बना कर नाम देवादास रख दिया । देवादास अपने गुरुदेव हरिचरणजी से दादूवाणी में कथित निर्गुणराम की निर्गुण भक्ति की पद्धति जान कर निरन्तर निगुणाराम का भजन करने लगे । अब उन्होंने 'अब बाबा के पग जाबा'' बोलना तो छोड़ दिया था और उसके स्थान में ''देव तुम्हारा भेव न जाने'' यह दिन भर बोलते रहते थे । और भजन करते थे ।
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जब कुछ बड़े हो गये तब हाथ में टोकरी लेकर 'देव तुम्हारा भेव न जाने'' बोलते हुये कंड़े चुनने जंगल में चले जाते थे । कंडे चुनते जाते थे और ''देव तुम्हारा भेव न जाने'' बोलते जाते थे । टोकरी कंडों की भर जाती थी तब ''देव तुम्हारा भेव न जाने'' बोलते हुये कंडों की टोकरी सिर पर धर कर स्थान में लाकर डाल देते थे । कभी-कभी कंडों की टोकरी भर जाती और उनको आगे जाने की इच्छा होती तो टोकरी के कंडे पृथ्वी पर डाल कर टोकरी खाली कर लेते और वहाँ से आगे चलने लगते तब बोलते- इन कंडों को कोई भी उठायेगा तो उसको बिच्छू काट खायेगा । उनके कंडे कोई भी नहीं उठाता था । वे ''देव तुम्हारा भेव न जाने'' बोलते हुये जहां तक उनकी इच्छा होती वहाँ तक जाकर लौट आते और कंडे सब लाकर स्थान में डाल देते । गाय भैंसों का गोबर भी आप ही थापते थे ।
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और कुछ बड़े हो गये तब आटा पीसने की सेवा भी करने लगे थे । आप शरीर पर कौपीन मात्र ही वस्त्र रखते थे । आगामी घटनाओं को भी पहले ही जान जाते थे । वि. सं. १९१९ में महन्त हरिचरणजी का चातुर्मास उदयपुर जमात में था । देवादास जी भी साथ ही थे । एक दिन देवादासजी ने महन्त जी से कहा आज अपनी घाटड़ा की प्रहलाद शाल के पीछे से दीवार तोड़कर चोर घुस गये हैं । तब महन्तजी कुछ चिन्ता करने लगे तो देवादास जी ने कहा- चिन्ता की कोई बात नहीं है, चोर अन्धे हो गये हैं, उनको निकलने का मार्ग नहीं मिल रहा है । प्रातः काल स्थान के संरक्षक उनको पकड़ कर अपना सब माल उनसे ले लेंगे । अपना कुछ भी नहीं जायगा ।
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दीवार तोड़ी है उसको भी वे ही बना देंगे और भविष्य में स्थान में चोरी नहीं करने की शपथ भी ले लेंगे । वे जाति के मीणे थे । भविष्य में मीणा जाति का कोई मनुष्य इस स्थान में चोरी नहीं करेगा । यह प्रतिज्ञा जब करी तब उनको पूर्ववत दीखने लगा था । फिर वे मंदिर में प्रणाम करके अपने घरों को लौट सके थे । फिर हरिचरणजी ने एक साधु को भेज कर समाचार मंगवाये तो देवादासजी की सब बात सत्य निकली थी ।
(क्रमशः)

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