गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ३७/४०*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
.
*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ३७/४०*
.
*कहि जगजीवन गया२ की, संगति गया बिलाइ ।*
*पिंड भरण तीरथ गया, रह्या न हरि गुन गाइ ॥३६॥*
(२. गया की=गया तीर्थ जाने वाले की)
संत जगजीवनदास जी चेताते हैं - जो व्यक्ति गया तीर्थ जाकर पिंड भरने के चक्कर में पड़ गया, वो सत्संगति से गया-बिलाया, अर्थात सत्संग से चूक गया, खो गया । वो गया तो पिंड भरने तीर्थ को, पर हरि के गुण गाना ही छोड़ बैठा । तीर्थ से बड़ा तो हरि का गुणगान है ।
.
*अंबु अनल उतपति इष्ट, हरि निज राखै मांहि ।*
*कहि जगजीवन रांम रस, ता थैं प्रापति नांहि ॥३७॥*
जो इष्टदेव जल और अग्नि से उत्पन्न हैं - यानी पत्थर की मूर्ति या तत्वों से बने हैं, उनको हरि ने अपने भीतर ही रखा हुआ है । संत जगजीवन जी कहते हैं - उन बाहरी इष्टों से राम-रस की प्राप्ति नहीं होती, राम-रस तो भीतर है ।
.
*जीवन साध तजि, तीरथ गया अग्यांन ।* 
*तिन कै पाछै जे गया, तिन का कैसा ग्यांन ॥३८॥*
जिसने अपने जीवन की सच्ची साधना - हृदय में राम को भजना - छोड़ दिया और केवल तीर्थों में भटकने को ही धर्म मान लिया, वह अज्ञान है । संत जगजीवन जी कहते हैं - अज्ञानी के पीछे-पीछे चलते हैं, उनके ज्ञान का तो कहना ही क्या ।
.
*संकर ल्यंग३ मूरति सुधर४, अलह अलख नहिं दोइ ।*
*कहि जगजीवन बंदगी, दिल अंदर करि जोइ ॥३९॥*
(३. संकर ल्यंग=शिवलिंग की मूर्ति)   (४. मूरति सुधर=कुशल कारीगर द्वारा भले प्रकार से बनायी गयी मूर्ति)
चाहे सुन्दर कारीगर से बनी हुई शंकर जी के लिंग की सुन्दर मूर्ति हो, और चाहे अलह-अलख कहा जाये - दोनों में कोई दोई नहीं है, दोनों एक ही साहिब के रूप हैं । संत जगजीवन जी कहते हैं - सच्ची बंदगी तो दिल के अंदर झाँक कर करने में है ।
.
*सांचा साहिब एक है, ओ ही आप अलेख ।*
*कहि जगजीवन सेवि हरि, जा कै रूप न रेख ॥४०॥*
सच्चा साहिब तो एक ही है, वही स्वयं अलेख है - जो लिखा न जा सके । संत जगजीवन जी कहते हैं - उसी हरि की सेवा करो, जिसका कोई रूप-रेखा नहीं, जो निराकार है ।
(क्रमशः) 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें