शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026

*२९. साधु महिमा का अंग ~३७/३९*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~३७/३९*
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*स्वर्ग लोक साधु सदन, वेत्ता१ वैकुण्ठ थान ।*
*रज्जब अज्जब ठौर ये, जहां भजन भगवान ॥३७॥*
साधक संत का स्थान स्वर्ग लोक है, ज्ञानी१ संत का स्थान वैकुण्ठ है, जहां भगवान का भजन होता है वे ये उक्त स्थान बड़े अदभुत हैं ।
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*हरि मंदिर साधु हृदय, जहां रहे निज अंग१ ।*
*सो चित्त चित्रशाला बनी, कवि कह सके न रंग ॥३८॥*
संत का हृदय ही हरि मन्दिर है, जहां अपने प्रिय१ परमात्मा रहते हैं, वह सन्त का चित्त जैसे कोई विचित्र चित्रशाला बनी हो ऐसा अनुपम दिखाई देता है, उसका प्रेमरूप रंग कुशल कवि भी नहीं कह सकता ।
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*चौदह विद्या चतुर ही, दहणारथ१ दे२ धाय३ ।*
*साधन कष्ट सभी करे, पर साधु हुआ न जाय ॥३९॥*
मनुष्य चौदह विद्याओं में भी चतुर हो जाता है, दहनार्थ१ अर्थात शरीर को जलाने के लिये भी दौड़३ लगाता२ है, अन्य भी सभी सभी साधन जन्य कष्ट सहन कर लेता है किन्तु उससे सन्त नहीं बना जाता ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२९. साधु महिमा का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

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