गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

*२९. साधु महिमा का अंग ~३३/३६*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~३३/३६*
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*लेखे१ में सब आइया, जे कछु उपज्या आय ।*
*रज्जब राम अलेख हैं, अरु साधु लिख्या न जाय ॥३३॥*
जो कुछ भी सृष्टि में उत्पन्न होकर दृष्टि में आये हैं, उन सबका यश लिखने१ में आ गया है किन्तु राम और साधु इन दोनों की महिमा अलेख है अर्थात इनका यश पूर्ण रूप से लिखा नहीं जाता ।
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*रज्जब अगह अगाध अंग१, सांई साधु दोय ।*
*और सु बंधे बंदि में२, चौरासी लख जोय ॥३४॥*
चौरासी लक्ष योनियों में जो भी उत्पन्न हुये हैं वे सभी तो सीमा के बंधन२ में बंधे हुये हैं अर्थात उनके गुण तथा यश पूर्ण रूप से कहे जा सकते हैं किन्तु परमात्मा और संत इन दोनों के लक्षण१ अन्य से ग्रहण नहीं किये जाते तथा दोनों की महिमा भी अगाध है ।
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*वृक्ष बीज वसुधा पड़हिं, बीज रहै वपु जाय ।*
*सत्य साधु गति१ शक्ति२ त्यों, नर देखो निरताय३ ॥३५॥*
वृक्ष और बीज दोनों पृथ्वी पर पड़ते हैं, उनमें वृक्ष तो नष्ट हो जाता है किन्तु बीज रह जाता है, वैसे ही हे नरो ! विचार३ करके देखो, सच्चे संत की मुक्ति१ होने पर भी उनकी ज्ञान२-शक्ति ग्रन्थों द्वारा पृथ्वी पर रह जाती है ।
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*अनेकों मिल एक की, सरभरि१ करी न जाय ।*
*रज्जब साधु सूर सम, पर नक्षत्र निरताय२ ॥३६॥*
संत सूर्य के समान हैं, अन्य नर अन्य नक्षत्रों के समान हैं, विचारों२ जैसे अनेक नक्षत्र मिलकर एक सूर्य के बराबर नहीं हो सकते, वैसे ही अनेक नर मिलकर भी एक संत की समता१ नहीं कर सकते ।
(क्रमशः) 

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