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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ६९/७२*
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*वेद बचन प्रतिपाल करि, अक्षर अक्षर गमि ग्यांन ।*
*कहि जगजीवन निर अक्षर हरि, तिस घर धर्या न ध्यांन ॥६९॥*
संत जगजीवनदास जी कहते हैं, वेद के एक-एक वचन का पालन करके, एक-एक अक्षर से ज्ञान की गति को समझ कर भी, अगर जीव ने निर-अक्षर(अविनाशी) हरि में ध्यान नहीं लगाया, तो सब व्यर्थ है । निर-अक्षर का अर्थ है जो अक्षरों से परे है, अविनाशी है । अक्षर ज्ञान तो साधन है, साध्य तो निर-अक्षर राम है ।
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*सब क्रित करै सरीर का, हरि क्रित करै न कोइ ।*
*कहि जगजीवन रांम क्रित, रांम क्रिपा लहै४ सोइ ॥७०॥*
(४. रामक्रिपाल=जा पै क्रिपा राम की होई)
सब लोग शरीर की कृति करते हैं, शरीर के सुख-साधन जुटाते हैं, पर हरि की कृति, हरि का भजन कोई नहीं करता । संत जगजीवन साहेब कहते हैं, राम की कृति वही कर पाता है, जिस पर राम की कृपा होती है । बिना कृपा के हरि-भजन में मन नहीं लगता ।
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*खरी कसौटी५ कीजिये, भुवन मंझि६ निज सांइ ।*
*कहि जगजीवन चित्र सब, निरखै प्रतिबिंब मांहि ॥७१॥*
(५. कसौटी=परख) (६. मंझि=मध्य)
इस भुवन के मध्य में अपने साईं की खरी कसौटी करो, सच्ची परख करो । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, जैसे चित्र में सब कुछ दिखता है पर वह केवल प्रतिबिंब है, वैसे ही यह सारा संसार उसी परमात्मा का प्रतिबिंब है । चित्र को देखकर चित्रकार को पहचानो, प्रतिबिंब को देखकर बिंब को पहचानो ।
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*जगजीवन साधै पवन, सोधै सबद सरीर ।*
*रांम भगति ले बाहिरा७, सतगुरु करै न सीर ॥७२॥*
{७. बाहिरा=बाह्य(सांसारिक) भोगों से}
कोई पवन को साधता है, प्राणायाम करता है, कोई शब्द से शरीर को शोधता है, परन्तु राम भक्ति के बिना वह बाहरी ही रह जाता है, भीतर प्रवेश नहीं कर पाता । संत जगजीवन साहेब कहते हैं, जब तक सतगुरु स्वयं उसे शीतल नहीं करता, सीर नहीं करता, तब तक वह बाहरी साधनों में ही भटकता रहता है ।
(क्रमशः)

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