सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

श्यामदासजी झालाना

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*श्री परमात्मने नमः*
*अथ सांभर शिष्य पर्व ३*
दादू नमो नमो निरंजनम्, नमस्कार गुरु देवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥
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*अथ अध्याय १~श्यामदासजी झालाना*
एक श्यामसिंह नामक चौहाण क्षत्रिय को घर से वैराग्य हुआ । तब उसने सोचा घर को त्याग करके भजन ही करना चाहिये । किन्तु भजन करने की पद्धति बताने वाला कोई उच्चकोटि का महात्मा मिले तब ही साधन मार्ग में आगे बढ़ा जा सकता है । इससे उसने प्रथम उच्चकोटि के महात्मा की खोज आरंभ कर दी । फिर किसी से सुना कि- सांभर में आज-कल एक दादू नामक संत बहुत उच्चकोटि के सुने जाते हैं । 
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वह सांभर आया और संत दादूजी के व्यवहार-विचारादि जीवनचर्या को वहां के लोगों से सुनकर बहुत प्रभावित हुआ । फिर भी उसने अपने मन में सोचा पहले परीक्षा करके ही गुरु बनाना चाहिये । परीक्षा कैसे करनी चाहिये ? इसके लिये उसने निर्णय किया- रात्रि में मैं इनके आश्रम में चोर के रूप में प्रवेश करूंगा और उस समय ऐसी चेष्टा करूंगा जिससे कि दादूजी तथा अन्य साधु जाग जायें । फिर दादूजी मेरे प्रति जो शब्द प्रयोग करेंगे, उन शब्दों से ही उनकी परीक्षा हो जायगी । यदि वास्तव में संत होंगे तब तो मेरे उस कार्य से वे रुष्ट होकर मुझे अनुचित शब्द नहीं कहेंगे तथा मेरे हितकर शब्द ही बोलेंगे । तब तो मैं उनको ही गुरु बनाकर उनके बताये हुये साधन में लग जाऊंगा । 
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यह निश्चय करके फिर वह एक दिन रात्रि को दादू आश्रम में घुसा और चोर के समान इधर-उधर देखने लगा । दादूजी ने तो उसे देख लिया था किन्तु वे कुछ न बोल कर भजन ही करते रहे । तब उसने पुस्तकें उठाने का बहाना बनाकर एक मोटी पुस्तक को नीचे गिराया । उसके गिरने के शब्द से कई संत जाग गये और परस्पर बोले - कौन अपरिचित व्यक्ति आश्रम में घुसा है ? पुस्तकें क्यों उठा रहा है ? दीख रहा है किन्तु पूछने पर भी उत्तर नहीं दे रहा है । यह सुनकर दादूजी ने कहा -
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“इत१ घर चोर न मूसै२ कोई, अंतर है सो जाणे सोई ॥टेक॥
जागहु रे जन तत्व न जाई, जागत है सो रह्या समाई ॥१॥
जतन जतन कर राखहु सार, तस्कर उपजे कौण विचार ॥२॥
इव३ करि दादू जाने जे, तो साहिब शरणागति ले ॥३॥
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जो अपने भीतर१ आत्मस्वरूप ब्रह्म है, उसे जो जानते हैं, उनके यहाँ अन्तः करण रूप घर से काम क्रोधादिक चोर ज्ञान-धन को नहीं चुरा२ सकते । हे लोगों ! मोह निद्रा से जागो जिससे ज्ञानजन्य सार आनन्द न जा सकेगा । जो ज्ञान जाग्रत में है, वह उसी आनन्द में समाया रहता है । यदि तुम बार-बार विचार रूप उपाय द्वारा सार ज्ञान की रक्षा करोगे, तो किस विचार से हृदय में कामादि चोर उत्पन्न हो सकेंगे ? 
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अर्थात आत्मज्ञान के रहते कामादिक को उत्पन्न करने वाला कोई भी विचार हृदय में नहीं आता । इस३ प्रकार जो आत्मा से अन्य कामादि को चोर जानकर सचेत रहता है तो, उसे प्रभु अपनी शरण में लेते हैं अर्थात् अपने में ही लय कर लेते हैं । उक्त पद सुनकर श्यामसिंह को दादूजी के भाव जानने की इच्छा हुई । 
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फिर दादूजी ने कहा - भैया ! तुम शीघ्र ही यहाँ से चले जाओ । यदि कोई नगर में पहरा देने वाला चौकीदार आ जायगा तो तुमको पकड़ लेगा फिर तुमको दुःख हो, उससे हमको भी दुःख होगा । फिर दादूजी ने संतों को कहा - संतों ! अधिक उच्च स्वर से मत बोलो और चोर-चोर मत पुकारो । ऐसा करने से जन-समूह एकत्र हो जायगा । वह इस बेचारे के लिए घातक सिद्ध होगा । अतः हल्ला मत करो । 
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चोर रूप श्यामसिंह ने दादूजी के मधुर वचन सुने तब सोचने लगा, ये वास्तव में सच्चे संत हैं । मेरे को बुरा न कहकर मेरे को बचाने की ही बात कह रहे हैं । अतः ये संत मेरे मार्ग प्रदर्शक गुरु बनने योग्य ही हैं । यह निश्चय करके उस समय तो वह चुपचाप चला गया । फिर प्रातःकाल प्रसाद लेकर दादूजी के पास आया । सामने प्रसाद रखकर दंडवत की और बोला - भगवन् ! रात्रि को चोर रूप में मैं ही आया था । अब आप मुझे शिष्य बनाकर उपदेश द्वारा अपनी साधन पद्धति बताने की अवश्य कृपा करें । 
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दादूजी ने उसे अधिकार के अनुसार उपदेश दिया और वे श्यामसिंह से श्यामदास बन गए और कुछ समय तक दादूजी महाराज के पास रहकर सत्संग भजन करते रहे और दादूजी महाराज की साधन पद्धति का अच्छी प्रकार अभ्यास हो गया तब अपने गुरुदेव दादूजी से आज्ञा लेकर सांभर से विचर गये । आप पूर्ण वैराग्य से साधु हुये थे । अतः एकांत में रहकर भजन करना ही इनको प्रिय लगता था । ये जन समूह से दूर ही रहते थे । एकांत में ब्रह्म भजन ही करते रहते थे । 
(क्रमशः)

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