सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

*४७. अध्यातम कौ अंग १०५/१०८*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग १०५/१०८*
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तेज पुंज नैणैं५ निरखि, बांणी कहै सुभाइ ।
कहि जगजीवन देव हरि, रांम रीझ रस पाइ ॥१०५॥
(५. नैणैं=नेत्रों से)
जब नेत्रों से उस तेज के पुंज को देख लेते हैं, तब वाणी स्वभाव से ही उसका बखान करने लगती है, संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि हे देव हरि, राम उसी प्रेम रस को पाकर रीझ जाते हैं ।
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तेज कहूं कै जोति हरि, झिलमिल कहूं कै नूर ।
कहि जगजीवन तेज कहुं, सोइ सकल भरपूर६ ॥१०६॥
(६. भरपूर=परिपूर्ण)
उसे चाहे तेज कहो, चाहे ज्योति कहो, चाहे झिलमिलाता हुआ नूर कहो । संत जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं वह तेज तो कहने की बात है, वास्तव में वही एक हरि सब जगह परिपूर्ण भरा हुआ है ।
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जे मन मांही गांस७ हरि, सो मोहि दीजै गास ।
ग्यांन ध्यांन बुधि विरह हरि, सु कहि जगजीवनदास ॥१०७ ॥
(७. गांस=भेद की बात)
हे हरि, जो भेद की गुप्त बात आपके मन में है, वही ग्रास-वही ज्ञान का टुकड़ा मुझे भी दे दीजिए । संत जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं ज्ञान, ध्यान, बुद्धि और विरह सब उसी एक हरि के लिए है ।
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चित मंहि अलख अगाध हरि, चित मंहि हरि हरि रांम ।
कहि जगजीवन नींपजै८, नख सिख भरि लै नांम ॥१०८॥
(८. नींपजै=उत्पन्न हो)
चित्त में ही वह अलख-अगाध हरि बसा है, चित्त में ही हरि-हरि राम बसा है । संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि वही नाम नख से शिख तक भर कर हृदय में उत्पन्न हो जाता है, रोम-रोम में प्रकट हो जाता है ।
(क्रमशः) 

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