सोमवार, 19 अक्टूबर 2026

*घाटड़ा की महन्त परंपरा*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम:  卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*सगुणा गुण केते करै, निगुणा न मानै एक ।*
*दादू साधू सब कहैं, निगुणा नरक अनेक ॥*
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*घाटड़ा की महन्त परंपरा*
१- सुन्दरदासजी बड़े २-प्रहलाददासजी ३- केशवदासजी ४- गरीबदासजी
५- मानदासजी ६- हरिभक्तजी ७- जयरामदासजी ८- रामदासजी ९- रामगोपालजी १०- हरिचरणजी ११- लछीरामजी १२- आशारामजी वर्तमान में हैं । 
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*महन्त रामदासजी*
वैसे तो केशवदासजी आदि घाटड़ा के महन्त सभी उच्चकोटि के संत हुये हैं किन्तु रामदासजी विशेष रूप से सिद्ध पुरुष हुये हैं । रामदासजी ने ही रामपुरा में रामशाला बनवाई थी । कारण- जयपुर नरेश की दी हुई भूमि रामपुरा में ही थी । अतः वहां रामशाला बनवाने की आवश्यकता थी । रामपुरा में गुसांइयों का मठ था उसमें कुछ गुसांई रहते थे । वे गुसांई रामदासजी से कुछ छेड़छाड़ करते रहते थे । 
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रामदासजी उच्च कोटि के सन्त थे । अत पहले तो कुछ समय तक उनके आघातों को सहन करते रहे किन्तु उनकी सहन शक्ति को उन गुसांइयों ने उनकी कमजोरी मानकर के अधिक गड़बड़ की तब रामदासजी ने उनको गधा बनाकर मठ से बाहर निकाल दिया था । रामपुरा घाटड़ा आदि आम पहले जयपुर राज्य के ही थे । अलवर राज्य की स्थापना लगभग २२५ वर्ष पहले प्रतापसिंहजी ने की थी । अब प्रतापसिंहजी की सातवीं पीढ़ी है । प्रतापसिंहजी के वंशज अलवर नरेश दादूजी के विशेष रूप से भक्त रहे हैं । 
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*महन्त हरिचरणजी*
घाटड़ा के महन्तों में महन्त हरिचरणजी भी ख्याति प्राप्त महन्त हुए हैं । इन्होंने घाटड़ा की प्रहलादशाल तथा घाटड़ा की शाखा रूप अन्य ११ राम-शालाओं के कुंडे मंत्र दिये थे । उनको धोकर वह जल देने से मानवों तथा पशुओं के भी नजर आदि अनेक रोग दूर होते हैं । वे १२ यूँ हैं- १- घाटड़ा २- बलदेवगढ़ ३- गोलाकावास ४- बरकड़ी ५- रोडिरहडिया ६- तिलवाड़ा ७- खोह ८- द्वन्दपुरी ९- कोटड़ी रामपुरा १०- मलारणा ११- लोकली(सिकराय केपास) १२- कागोता ।
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प्रहलाददासजी के समय घाटड़ा में ३५० कोटड़ियां धीरावत ठाकुरों की थीं । वे सभी प्रहलाददासजी महाराज की कृपा से संतों की सेवा में लग गये थे, किन्तु भक्तों की सन्तानें ही आगे चलकर महन्त हरिचरणजी के समय तक भक्ति विहीन होकर संतों की विरोधी बन गई थीं । घाटड़े में बसन्त पंचमी पर मेला भरता था । 
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उस समय संत बहुत आते थे । अतः आश्रम की छत पर भी चढ़ते थे । इससे घाटड़े के जो अश्रद्धालु धीरावत ठाकुर थे एक मेले के समय महन्त हरिचरणजी से बोले-साधु छत पर नहीं चढ़ने चाहिये । साधु छत पर चढ़ते हैं तब हमारी ठकराणियां संकोचवश कोटड़ियों के चौक में नहीं निकल सकती हैं । तब महन्त हरिचरणजी ने कहा- प्रथम तो मातायें संतों से संकोच करती ही नहीं हैं । कारण- संत तो उनको माता के रूप में देखते हैं और मातायें भी संतों को पिता तुल्य देखती हैं । 
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ऐसी स्थिति में संकोच का काम ही क्या है? फिर भी संकोच करती हैं तो मेला तो चार दिन का है । मेले के चार दिनों में बाहर चौक में नहीं निकलें । मेले के दिनों में हम किस २ को कहें । अधिकतर अनजान ही आते हैं और हम यहां के निवासी सब आने वालों की भोजनादि सेवा में लगे रहते हैं । अतः इस बात का विशेष ध्यान हर समय कैसे रह सकेगा । महन्तजी ने उचित ही कहा था किन्तु उन प्रमादी ठाकुरों ने महन्तजी की बात पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया और मदिरा पान करके मंदिर के द्वार पर आकर बोले-नहीं मानता है तो इस दूंदल्या महन्त की दूंद(मोटा पेट) फोड़ दो । 
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यह सुनकर महन्त हरिचरणजी ने कहा- अब या तो यहां पर आप लोग ही रहेंगे या संत ही रहेंगे । तुम्हारे पूर्वजों ने श्रद्धा पूर्वक लाकर घाटड़ा में संतों को बसाया था और तन मन धन से संतों की सेवा की थी किन्तु उन भक्तों की ही संतानें अब संतों से ईर्ष्या करने लगी हैं । तब ऐसी स्थिति में संत कैसे रहेंगे¹, किन्तु फिर भी मुझे विश्वास है कि संतों के सहायक भगवान् हैं । इससे संतों का आप कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेंगे । 
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आप लोग ही यहां से चले जायेंगे और नहीं जायेंगे वे नष्ट हो जायेंगे । संत यहां ही रहेंगे और छत पर भी चढ़ेंगे । फिर महन्त हरिचरणजी की भविष्य वाणी सर्वथा सत्य ही हो गई । प्रहलाददासजी के समय धीरावतों की ३५० कोटड़ियां घाटड़े में थीं किन्तु अब एक भी नहीं है । विशेष तो वहां से उठकर चले गये और कोई रह गये तो उनका वंश नष्ट हो गया । अब वहां धीरावतों की स्मृति दिलाने वाला उनकी कोटड़ियों का मुख्य द्वार खड़ा है और कुछ भी नहीं है । संतों से ईर्ष्या का परिणाम ऐसा ही होता है ।
(क्रमशः)

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