शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

*२९. साधु महिमा का अंग ~९/१२*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~९/१२*
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*आकार भार छाया अरु वास, जन कपूर के चार्यों नास ।*
*अंजन१ पलट निरंजन होई, यह गति बूझे विरला कोई ॥९॥*
जैसे कपूर का आकार, भार, छाया और गंध चारों ही वायु के संग से चले जाते हैं, वैसे ही संत के भी चारों परमार्थ विचार द्वारा चले जाते हैं, वह मायिक१, आकार से बदलकर निरंजन ब्रह्म को प्राप्त होता है, इस निरंजन ब्रह्म की प्राप्ति रूप गति को कोई विरला ज्ञानी ही समझता है ।
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*साहिब सौं साधु बड़े, साधु बड़ा न कोय ।*
*रज्जब देख्या गुरु दृष्टि, सब नीके कर जोय१ ॥१०॥*
परमात्मा से संत बड़े हैं, संतों से बड़ा कोई नहीं है, यह हमने गुरदेव की ज्ञान-दृष्टि द्वारा देखा है, हे साधक ! तू भी सबको अच्छी प्रकार विचार करके देख१ ।
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*सेवक स्वामी एक ह्वै, ता ऊपरि अधिकार ।*
*यथा बुदबुदा वारि शिर, देखे सब संसार ॥११॥*
सेवक स्वामी के साथ एक हो जाता है, उस एकता पर भी जैसे जल का बुदबुदा जल रूप होने पर भी जल के ऊपर रहता है, इसको सब संसार देखता है वैसे ही सेवक का अधिकार स्वामी के ऊपर रहने का होता है ।
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*स्वामी सेवक शिर धर्या, आदू अदभुत बंध ।*
*रज्जब पेख्या पुहमि पर, पुत्र पिता के कंध ॥१२॥*
स्वामी ने सेवक को शिर पर ही धारण किया है, यह अदभुत संबन्ध आदि काल का ही है, हमने वर्तमान में भी पृथ्वी में पुत्र को पिता के कंधे पर देखा है । अत: संत हरि से अधिक है ।
(क्रमशः)

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