शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

*२९. साधु महिमा का अंग ~५/८*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~५/८*
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*साधु अगाध अगस्त्य है, सांई सुधा समुंद ।*
*उभय समाने उभय उर, रज्जब रही न बुंद ॥५॥*
संत तो अपार महिमा वाले अगस्त्य ऋषि के समान हैं और परमात्मा अमृतमय समुद्र के समान हैं । जैसे समुद्र पान के समय समुद्र अगस्त्य में समा गया था, एक बिन्दु भी शेष न रही थी और समुद्र के अभिमानी देवता के हृदय में अगस्त्य का आकार बस रहा था, वैसे ही संत के हृदय में हरि और हरि के हृदय में संत रहते हैं ।
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*वृक्ष बीज मीश्रित सदा, सेवक स्वामी तेम१ ।*
*पाला पानी होत हैं, पुनि पानी तैं हेम२ ॥६॥*
जैसे बीज में वृक्ष है और वृक्ष में बीज, वैसे ही१ सेवक में स्वामी है और स्वामी में सेवक है । जैसे बर्फ२ जल बन जाता है और जल ही पुन: बर्फ बन जाता है वैसे ही परमात्मा संत बन जाते हैं और संत परमात्मा बन जाते हैं ।
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*माया ब्रह्म ने जो किया, सो उन बाहर नाँहिं ।*
*रज्जब साधु अगाध दिल, उभय समाने माँहिं ॥७॥*
माया और ब्रह्म ने जो संसार रचा है, वह उनके बाहर नहीं है, किन्तु संत का हृदय तो महान् अगाध है कारण, माया और ब्रह्म दोनों उसमें समाये हुये हैं, यद्यपि संत माया का चिन्तन नहीं करते किन्तु माया ब्रह्म से अलग नहीं रह सकती । अत: वह संत के हृदय में है किन्तु संत को मोहित नहीं कर सकती, संत उसे मिथ्या समझते हैं ।
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*साधु शक्ति१ कपूर गति, अकल कला इहि भौन२ ।*
*सह गुण निर्गुण होत है, मिल परमारथ पौन३ ॥८॥*
साधु की माया१ की गति कपूर के आकार की गति के समान होती है, जैसे कपूर में भार और गंध रूप कला दिखाई देती है, किन्तु वायु३ मिलने पर वह अकल हो जाती है, अर्थात भार और गंध दोनों ही कपूर के स्थान में नहीं रहते, वैसे ही संसार-भवन२ में संत की सगुणता रूप शरीरादि माया परमार्थ विचार होने पर नहीं रहती, वे निर्गुण ब्रह्म-रूप ही हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

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