*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~२१/२४*
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*नाम निनिमे१ के धरे, करी सु सेवा ठौर ।*
*ताथे रज्जब राम के, साधु सवा२ न और ॥२१॥*
नाम रहित१ निरंजन राम के नाम धरे है और निष्काम अवस्था रूप स्थान में स्थित रहकर भक्ति की है, इसलिये राम के प्रिय संत के चतुर्थाश२ के समान भी अन्य नहीं हो सकते हैं ।
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*रज्जब भक्त भण्डार में, राख्या नाँणा नाम ।*
*तो देखो भगवन्त घर, साधु शिरोमणि ठाम ॥२२॥*
संत ने अपने अन्त:करण रूप भण्डार में नाम रूप धन रक्खा है तब ही तो देखो, भगवान ने अपने संसार रूप घर में संत को सर्वशिरोमणी स्थान प्रदान किया है, अर्थात संत को अपना स्वरूप ही बताया है ।
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*व्योम विराजे धू धरे१, पाताल पन्नगपति२ संत ।*
*रज्जब मंडन३ मांड के, मन वच कर्म महंत४ ॥२३॥*
संत ध्रुव आकाश में विराजते हैं और संत शेषजी२ पाताल में रक्खे१ गये है, फिर भी हम मन, वचन कर्म से कहते हैं कि महान्४ संत सभी ब्रहमाण्ड के भूषण३ हैं, चाहे वे कहीं भी विराजें ।
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*मात मही मधि पैठि१ कर, सुमिरे शुकदेव शेष ।*
*रज्जब छिप्यों न वित२ छिपे, प्रकट भये सब देस ॥२४॥*
शुकदेव के माता के उदर में प्रवेश करके और शेषजी ने पृथ्वी में प्रवेश१ करके स्मरण किया, इस प्रकार छिपने पर भी उनका भजन-रूप धन२ नहीं छिप सका, वे दोनों विश्व में सभी देशों में प्रकट हो गये हैं ।
(क्रमशः)

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