मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

*२९. साधु महिमा का अंग ~२५/२८*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~२५/२८*
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*अकलि१ अल्प उनमान२ तुच्छ, जो कुछ कहै बनाय ।*
*रज्जब सांई साधु की, महिमा कही न जाय ॥२५॥*
ईश्वर और संत की महिमा कहते समय जो कुछ भी बनाकर कहा जाय, उसमें कहने वाले की बुद्धि१ अल्प और अनुमान२ भी तुच्छ ही सिद्ध होते हैं, कारण, ईश्वर और संत की महिमापूर्ण रूप से कथन नहीं की जा सकती ।
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*रज्जब महिमा साधु की, मोपै कही न जाय ।*
*आदि अंत मधि मांड में, जो निबहै इक भाय१ ॥२६॥*
जो संत जीवन के आदि, मध्य, अंत तक इस ब्रह्मांड में संतपने के भाव१ का एक रस निर्वाह कर लेता है, उस संत की महिमा मेरे से पूर्ण रूप से नहीं कही जा सकती ।
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*एक रंग राता रहै, दूजे रंग रुचि नाँहिं ।*
*जन रज्जब ता संत सम, को कहिये कल माँहिं ॥२७॥*
जो एक अद्वैत ब्रह्म-रंग में अनुरक्त रहता है, द्वैत रूप विषय-रंग की प्रीति जिसमें नहीं होती, उस संत के समान इस कलयुग में किस को कहा जा सकता है ? अर्थात उसके समान कोई नहीं है ।
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*बन्दे एक खुदाय के, आदि अंत मधि अब्ब ।*
*जन रज्जब मस्तक धरै, मन वच कर्म सौं सब्ब ॥२८॥*
सृष्टि के आदि काल के, मध्यकाल के, अन्त के और अब वर्तमान काल के ईश्वर के प्यारे संत सभी एक से हैं, हम तो मन, वचन और कर्म से सभी को मस्तक पर धारण करते हैं अर्थात शिरोमणि समझते हैं ।
(क्रमशः) 

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