मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026

*हरिदासजी की वाणी*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*जब द्रवो तब दीजिये, तुम पै मांगूं येहु ।*
*दिन प्रति दर्शन साधु का, प्रेम भक्ति दृढ़ देहु ॥*
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फिर राजा ने हरिदासजी से प्रार्थना की—कि भगवन् ! श्यामदासजी को तो यहां रहने की आज्ञा दीजिये । वे आपके सुयोग्य शिष्य हैं उनसे ही हम संतोष धारण करेंगे । फिर हरिदासजी महाराज ने राजा के अधिक आग्रह पर श्यामदासजी, चतुरदासजी, केवलरामजी, को वहां ही छोड़ दिया था, उनके भोजन-वस्त्र का प्रबन्ध राजद्वार मे ही होता था किन्तु आगे चलकर हृदयरामजी सूर्य की किरण जैसे सब घरों में जाती है, वैसे सब घरों से भिक्षा करके ही भोजन करते थे ।
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इस प्रकार तीन संत आमेर रहने लगे, शेष सब हरिदासजी के साथ ही रम गये । हरिदासजी महाराज अपने शिष्य मंडल के साथ इच्छानुसार भ्रमण करते हुये हिंडौन में पधारे तब उनको हिंडौन में अनुकूलता प्रतीत हुई तथा भ्रमण विशेष कर चुके थे और हिंडौन में भक्तों का भी अति आग्रह था । इससे आप हिंडौन में ही रह गये । वहां ही भक्तों ने आपके लिये सेवा का सब प्रकार का प्रबन्ध कर दिया फिर वे वहां ही रहने लगे ।
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*हरिदासजी की वाणी*
हरिदासजी हापाजी के २५ छप्पय कवित और कुछ साखी भी देखने में आई हैं । २५ में से १८ तो दादूजी की महिमा के हैं । २ में गरीबदासजी की महिमा की है । २ बड़े सुन्दरदासजी की भेंट के हैं । शेष तीन प्रहलाददासजी की भेंट के हैं । इनकी रचना का एक उदाहरण भी देखिये—
छप्पय-
‘गुरु दादू अरु राम, एक कुछ अन्तर नांहीं ।
कीये आप समान, चरण शरणे जे आहीं ॥
आप करें रस पान, सोई सब आत्म पावें ।
निराकार को नाम लेय, संतन सुमिरावें ॥
आतम अनन्त उधारि जग, कर्म काट कर ब्रह्मवत ।
हरिदास पार न लहै, विदित थके मो मति भ्रमित ॥५॥’
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*हरिदासजी हापा के शिष्य*
एक टेक हरि नाम की, हापाजी के शिषन के ।
टीके ऊधोदास, धर्म धीरज की आगर ।
रथ राधो के राम, बैठ उन कियो उज गर ॥
दीरघ दिन न कल्याण, उदयचंद ईश्वर अर्जुन ।
आनन्द लाल दयाल, श्याम गोविन्द यश गर्जन ॥
तुलसी है हरिराम, पार्वती जानो वाई ।
टीकू दो भगवान, सकल जानी गुरु भाई ॥६६॥ भक्त माल
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हरिदासजी हापा के शिष्यों के एक हरिनाम चिन्तन करने की ही टेक थी । हापाजी की गद्दी पर हिंडौन में उद्धवदासजी बिराजे थे । उद्धवदासजी धर्म और धैर्य की तो खानि ही थे अर्थात् धर्म और धैर्य उद्धवदासजी के मन में निरंतर रहते थे । राघवदासजी के आशा रूप रथ पर रामजी बिराजे थे अर्थात् उनकी इच्छा अधूरी नहीं रही थी । इच्छानुसार उनसे कार्य कराकर उनको प्रकट किया था । 
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कल्याणदासजी दिनों में तो बड़े नहीं थे, तो भी ज्ञान ध्यानादि में बहुत बड़े थे । उदयचन्दजी, ईश्वरजी, अर्जुनजी, आनन्दजी, लालजी, दयालजी और श्यामजी ये सब गोविन्द का यश गर्जन करते थे अर्थात् उच्च स्वर से गाया करते थे । तुलसीजी, हरिरामजी, पार्वती बाईजी, टीकूजी और दो भगवानजी, ये सभी गुरु भाई ज्ञानी थे । ज्ञान पूर्वक प्रभु का भजन करते थे ।
(क्रमशः)

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