मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026

*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~१/४*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~१/४*
इस अंग में सन्त संगती ही प्राणी के लिए परम लाभ रूप है, यह कहेंगे -
.
*साधु संगति सुठि१ भली, घड़े२ माँहिं घड़३ लेय ।*
*रज्जब सौंज४ सँवारि कर, जीव माँहिं जिव५ देय ॥१॥*
संतों की संगति अच्छी से भी अच्छी१ है, ईश्वर के बनाये२ हुये शरीर में भी भक्ति ज्ञानादि सुखद साधन उत्पन्न३ कर देती है और कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय, अन्त:करणादि सभी सामग्री४ सुधार कर जीव में भी जीव देती है अर्थात ब्रह्म प्राप्ति व परमशांति५ देती है ।
.
*जैसे चन्दन बावना, वेधि१ गया वनराय२ ।*
*त्यों रज्जब पलटे सबै, साधु संगति आय ॥२॥*
जैसे बावने चन्दन की सुगंध से सभी वन पंक्ति२ विद्ध१ हो जाती है अर्थात सभी वृक्ष चन्दन बन जाते हैं वैसे ही साधु संगति में आकर सभी बदल जाते हैं, अर्थात संत बन जाते हैं ।
.
*लोहा पारस परसतों, रूद्र१ रूप ह्वै जाय ।*
*रज्जब गत२ ज्ञाता भया, साधु संगति आय ॥३॥*
लोहे के भयंकर शस्त्र को पारस का स्पर्श मिलता है तब उसका भयंकर१पना चला जाता है और वह प्रिय दर्शन सुवर्ण रूप बन जाता है, वैसे ही साधु संगति में आने से जीव का जो ब्रह्म से भिन्न ज्ञातापना है वह चला२ जाता है, वह ब्रह्म का ज्ञाता अपने को न मानकर ब्रह्म रूप ही मानता है ।
.
*पारस परसत लोह, सौंधे१ सौं महँगा भया ।*
*तो क्यों न करीजे मोह, रज्जब साँचे साधु सौं ॥४॥*
लोहा पारस से मिलते ही सस्ते१ से महँगा बन जाता है, वैसे ही सन्तों की संगति से जीव की उन्नति होती है, फिर संतों से प्रेम क्यों नहीं करना चाहिये ? अवश्य करना चाहिये ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें