*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~५/८*
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*रज्जब पारस परसते, लोहा पलट्या गोत१ ।*
*त्यों निर्धन धनवंता मिल, अ वित्त२ स वित्ता३ होत ॥५॥*
लोहा पारस से मिलता है तब उसका गोत्र१ बदल जाता है फिर वह लोह न कहलाकर सुवर्ण कह लाता है, वैसे ही ज्ञान-धन से युक्त संत से मिलकर निर्धन अज्ञानी प्राणी, ज्ञान-धन से रहित२ होने पर भी ज्ञानधन - युक्त३ होकर ज्ञानी कहलाता है ।
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*रज्जब लघु दीरध मिलत, मान महातम जोय१ ।*
*यथा तक्र२ पय३ परसतों, जावण हुं दधि होय ॥६॥*
देखो१, जैसे थोड़ी-सी छाछ२ दूध३ में मिलती है, तब वह जावण भी दही बन जाता है, वैसे ही यह बात निश्चित रूप से मानो कि - जब छोटे बङों से मिलते हैं तब छोटे का महात्म्य बढ़ जाता है अर्थात साधारण जीव की संत संग से उन्नति होती है ।
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*रीते संगति भर्यों की, जे हुंहि भूरि१ सु२ भाग ।*
*देख दश गुने होत हैं, शून्य सु एक हिं लाग ॥७॥*
यदि बहुत१ अच्छा२ भाग्य होता है तब कहीं ज्ञान-धन से खाली प्राणी को ज्ञान-धन से परिपूर्ण संतों का संग मिलता है, मिलने पर तो देखो, एक(१) पर शून्य(०) लगते ही दश(१०) गुना हो जाता है, वैसे ही अज्ञानी ज्ञानी हो जाता है ।
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*भव-सागर संसार यह, साधू शुद्ध जहाज ।*
*रज्जब परसे पार ह्वै, कठिन सरे यहु काज ॥८॥*
यह संसार जन्म से आदि दुखों का समुद्र है इससे पार करने के लिये निर्विकार संत ही जहाज हैं, जो उन संतों का संग करते हैं, वे इस भव-सागर से पार हो जाते हैं, उनका यह कठिन कार्य संत द्वारा सिद्ध हो जाता है ।
(क्रमशः)

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