बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

*३०. तीर्थ सत्संग का अंग ~९/११*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३०. तीर्थ सत्संग का अंग ~९/११*
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*तीरथ आतम राम है, परसे१ पावन होय ।*
*जन रज्जब पहुँचे बिना, अध उतरे नहीं कोय ॥९॥*
आत्म रूप राम ही तीर्थ है, उससे मिलते१ ही प्राणी पवित्र होकर पवित्र करने वाला हो जाता है । आत्मा और राम की अभेद अवस्था में पहुंचे बिना सर्वथा पाप नहीं उतरते, कारण, प्रायश्चित द्वारा पाप नष्ट करने पर भी कर्तृत्व भाव होने से पुनः हो जाता है ।
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*चरणार्विन्द ते प्रकटी, साधु हृदय मँझार ।*
*रज्जब गंगा ज्ञान की, मन मल मज्जन हार ॥१०॥*
संतों के हृदय स्थान में स्थित परमात्मा के स्वरूप भूत चरण कमलों से ज्ञान-गंगा प्रकट हुई है, इसका ब्रह्म साक्षात्कार रूप जल पाप रूप मल को सदा के लिये हटाकर मन को उज्वल करने वाला है ।
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*सलिता१ साधु जवाब जल, मन मल मज्जन होय ।*
*रज्जब रज यूं ऊतरे, उर अंतरि अध धोय ॥११॥*
साधु ही नदी१ है, प्रश्न का उत्तर ही जल है, संतों के साथ प्रश्नोत्तर होने से मन का संशय रूप मल हटकर मन संशय-रहित उज्वलता को प्राप्त होता है । इस प्रकार हृदय के भीतर का संशय रूप पाप धोया जाता है, तब अविद्या रूप रज भी उतर जाती है । अविद्या नष्ट होते ही ब्रह्म प्राप्ति रूप जीवन का लक्ष्य पूरा हो जाता है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “३०. तीर्थ सत्संग का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

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