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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू खालिक खेलै खेल कर, बूझै बिरला कोइ ।*
*लेकर सुखिया ना भया, देकर सुखिया होइ ॥*
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*घाटड़ा में संत दर्शन*
१- घाटड़ा धाम में कभी २ गुप्त संतों के दर्शन भी होते रहते हैं । वि . सं . १९७९ में पर्वत पर सुन्दरदासजी प्रहलाददासजी के भजनाश्रम(भैंड़ी) पर एक बुढ़िया माता को एक दिव्य संत का दर्शन हुआ था । फिर उस बुढ़िया ने ग्राम में आकर कहा था । तब आस पास के ग्रामों के बड़े बूढ़े लोगों ने कहा था— वे भैंड़ी वाले महाराज सुन्दरदासजी ही थे । जिनके पुण्य होते हैं उनको वे दर्शन दे देते हैं । दादूजी महाराज ने भी सुन्दरदासजी को कहा था— ‘‘पुण्यवान को दर्शन देना’’ ।
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२- वि . सं . २०१५ की घटना है— जयसिंह पुरा का कल्याणा नामक मीणा एक दिन चातुर्मास के समय में प्रहलाद शाल में रह गया था । रात्रि के समय प्रहलाददासजी महाराज के स्नान की शिला जो प्रहलाद शाल के उत्तर पूर्व की छत्तर के साईवान के नीचे एक छोटी चबूतरी पर है उसकी पूजा भी होती है दीपक भी जलाया जाता है । उधर से उसको दो संत आते दिखाई दिये । उनको आते देखकर उसने अपना मुख अपनी धोती से ढक लिया । एक संत ने उसके खड़ाऊ की ठोकर मारकर कहा— चल दे यहां से ।
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वह उठकर भागा और महन्तजी की खटिया में उलझकर गिरा । उसके पड़ने के शब्द से महन्तजी जाग गये । उसने महन्तजी को उक्त घटना सुनाई । महन्तजी ने कहा— तू कोई बुरे विचार कर रहा था क्या ? उसने कहा— हां । उस समय मेरे मन में बुरी बातें ही उठ रही थीं । महन्तजी ने कहा— यह तो महात्मा की तपोभूमि है । इसमें भजन करने वाला शुद्ध विचारों का व्यक्ति ही रह सकता है । जहां उसके खड़ाऊ की ठोकर लगी थी वहां भयंकर दर्द होने लगा । वह अलवर के अस्पताल में गया किन्तु वहां के इलाज से भी ठीक नहीं हुआ । १५ वें दिन उसी खड़ाऊ की चोट के दर्द से उसकी मृत्यु हो गई थी । उक्त घटना से सूचित होता है कि प्रहलाद शाल और उसके द्वार वाले तिवारे में कुविचारों वाला नहीं रह सकता है ।
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३- एक दिन घनश्यामदास को समाधि के तिवारे में एक भूरी लटुरिया वाला संत दंडवत करता हुआ मिला । उनकी दंडवत होने के पश्चात् घनश्यामदास ने उन संतजी को प्रणाम करके भोजन करने के लिये प्रार्थना की । संतजी ने कहा— अभी कोई विशेष आवश्यकता नहीं है । घनश्यामदास ने आग्रह पूर्वक कहा— विशेष नहीं तो भी जितनी आवश्यकता हो उतना ही पाने की कृपा करें । घनश्यामदास ने बहुत आग्रह किया तब वे उनके साथ-२ चले । मार्ग में गुल्लीदंडा खेलने वालों की ओर घनश्यामदास की दृष्टि गई । उसी समय संत वहां ही अंतर्धान हो गये । फिर उनका कहीं भी पता नहीं लगा ।
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४- वि . सं . १९६० में उदयपुर जमात के मनीरामजी के अखाड़ा के सांडकोटड़ा के स्थान के नारायणदासजी ने अपनी इच्छा पूर्ति पर प्रहलाद शाल के पीतल के पत्र युक्त कपाट चढ़ाये थे और तीन ओर चद्दर के साईवान लगाये थे । इससे सूचित होता है कि घाटड़ा धाम की भावना रखने पर कामनायें भी पूर्ण होती हैं ।
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५- वि . सं . २०२४ की घटना— *मृतक भी जीवित* घाटड़े के बोदन कुम्हार की पत्नी रामप्यारी का बच्चा जिसकी अवस्था १२ मास से कम ही थी, एक दिन सहसा मर गया । रामप्यारी की दादूजी महाराज पर अटूट श्रद्धा थी । वह जैसे बच्चा मरने पर मातायें रोती हैं, वैसे रोई तो नहीं और शव को लेकर दादूजी महाराज का ध्यान करती हुई प्रहलाद शाल पर आई ।
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प्रहलाद शाल(दादू वाणी मंदिर) के द्वार पर बैठकर यह बोलते हुये ‘‘दादूजी महाराज ! यह बच्चा आपका ही है और आपका ही रहेगा, आप इसे जीवित कर दें’’ शव को प्रहलाद शाल के भीतर रख दिया । इस समय महन्तजी प्रहलाद शाल के पीछे बगीचे के कूप पर थे । उन्होंने यह सुना तब वे आये और देखा बच्चे का शव शाल में पड़ा है और रामप्यारी बाहर ध्यानस्थ है । महन्तजी ने कहा— बाई ! जीवित को लाकर रखती तब तो ठीक था । अब मृतक को लाकर शाल में पटकने से क्या लाभ है ?
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यह सुनकर भी रामप्यारी कुछ नहीं बोली— वह तो दादूजी का ध्यान कर रही थी । उक्त प्रकार लगभग २० मिनट रामप्यारी के ध्यानस्थ रहने पर बच्चा सहसा जीवित हो गया । फिर रामप्यारी का ध्यान टूटा । उसने बच्चे को जीवित देखा और दादूजी महाराज की जय बोलकर बच्चे को उठा लिया । फिर प्रणामादि करके घर को लौट गई । अब वह बच्चा लगभग ९ वर्ष का है, अच्छी स्थिति में है । बोदन का परिवार दादूजी महाराज को ही मानता है, अन्य देवी देवताओं को नहीं मानता ।
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६- देवादास जी के साथी एक कूबड़दासजी महात्मा थे, ये भी उच्च कोटि के संत थे । उनकी कुटिया प्रहलादशाल के पीछे के बाग के कूप के पास छोटी सी पक्की बनी हुई है और अभी तक अच्छी स्थिति में है । भक्त लोग अपनी इच्छा पूर्ति के लिये— देवादासजी व कूबड़दासजी की सवामणी बोलते हैं और इच्छापूर्ण हो जाने पर करते हैं । उसे भण्डारा बोलते हैं । इस से सूचित है वे कूबड़दासजी भी अच्छे संत थे ।
(क्रमशः)

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