*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२९. साधु महिमा का अंग ~२९/३२*
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*शुक्र सूर विधु१ वृहस्पति, पंचम धू दिशि देख ।*
*वन्दनीक२ सब वन्दिये, अचला चलन विशेष ॥२९॥*
शुक्राचार्य, सूर्य, चन्द्रमा१, वृहस्पति और पंचम ध्रुव की ओर देखो, जो अचल है और शेष चार चलने वाले हैं किन्तु इनमें न्यूनता-विशेषता नहीं सभी पूजनीय२ हैं, सभी को प्रणाम करना चाहिये । संत सभी समान हैं ।
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*साधु सूरज सारिखे१, दृष्टि इष्ट संग देश ।*
*रज्जब रार्यों राजवी२, जहां करहि परवेश ॥३०॥*
साधु और सूर्य समान१ हैं, साधु की दृष्टि अपने ईष्ट परमात्मा के संग और सूर्य की दृष्टि अस्ताचल प्रदेश के साथ लगी रहती है किन्तु फिर भी संत और सूर्य जहां भी प्रवेश करते हैं वहां ही नेत्रों२ को आनन्दित करते हैं । संत ज्ञान नेत्रों को भी खोलते हैं, यह उनमें विशेषता है ।
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*समझे सोने१ सारिखे, सो महँगे महि माँहिं ।*
*रज्जब प्यारे पुहमि२ पर, जहां जगत में जाँहिं ॥३१॥*
पृथ्वी१ में ज्ञानी२ संत सोने के समान हैं, सोना कम होने से महंगा है वैसे ही ज्ञानी कम होने से महंगे हैं । सोना और संत पृथ्वी पर प्यारे ही लगते हैं किन्तु संत तो जगत् में जहां भी जाय वहां सभी को प्यारा लगता है ।
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*साधु उदय सूरज कला१, गुण तारे तम नाश ।*
*रज्जब रारि२ खुलैं सबै, चखि चेतन३ परकाश ॥३२॥*
साधु का जन्म सूर्य की प्रकाश शक्ति१ के समान है, जैसे सूर्य के प्रकाश से तारे और अँधेरे का अभाव हो जाता है और नेत्र२ सबके खुलकर देखने में समर्थ होते हैं, वैसे ही सन्त के संग से आसुर गुण और अज्ञान का नाश हो जाता है तथा ब्रह्म के ज्ञान प्रकाश द्वारा ज्ञान-नेत्र३ खुलकर सत्या-सत्य को देखने में समर्थ होते हैं ।
(क्रमशः)

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