🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४८. सतगुरु कौ अंग ७/९*
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जै जै जै जै जयं जय, जै जै जै जगदीस ।
कहि जगजीवन जज तज जन, सतगुरु सौंपित सीस ॥७॥
जय जय जय जय, जय हो, हे जगदीश तुम्हारी जय हो । संत जगजीवन जी कहते हैं, भक्त अपना यज्ञ, अहंकार त्याग कर, अपना शीश सतगुरु को सौंप देता है ।
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सतगुरु पहरि३ सरीर हरि, तेज पुंज करि राखि ।
कहि जगजीवन रांमजी, तो एह साँची साखि ॥८॥
{३. पहरि-प्रहरी(संरक्षक)}
सतगुरु शरीर में पहरेदार बनकर हरि की ज्योति की रक्षा करते हैं, और उसे तेज पुंज बनाकर रखते हैं । जगजीवन जी महाराज कहते हैं, हे रामजी, यही सच्ची साक्षी है ।
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कहि जगजीवन रांमजी, तेज पुंज तन होइ ।
तुम सरणागति आतमा, तुम हरि राखौ मोहि ॥९॥
जगजीवन जी महाराज कहते हैं, हे रामजी, मेरा तन आपका तेज पुंज बन जाये । मेरी आत्मा आपकी शरण में है, हे हरि, आप ही मेरी रक्षा करो ।
(क्रमशः)

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