रविवार, 11 अक्टूबर 2026

*घाटड़े पधारना*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू गोविन्द के गुण बहुत हैं, कोई न जाणै जीव ।*
*अपणी बूझै आप गति, जे कुछ किया पीव ॥*
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*घाटड़े पधारना*
फिर एक दिन धीरावत ठाकुरों के अति आग्रह से सुन्दरदासजी और प्रहलाददासजी ने ठाकुरों के साथ घाटड़ा के लिये प्रस्थान किया और ब्रह्मभजन करते हुये दोनों महात्मा घाटड़े पहुँचकर जिसको अब बड़ाबाग बोलते हैं, उसके कूप के पास जो जालका वृक्ष है और अब भी अच्छी स्थिति में विद्यमान है, उसकी छाया में जाकर विराजे और ठाकुरों को कहा—हम यहां ही रहेंगे बस्ती में नहीं चलेंगे । ठाकुरों ने कहा—बहुत अच्छा ।
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फिर ठाकुरों ने वहां ही सब प्रकार की सेवा का प्रबन्ध कर दिया और स्वयं सेवा में रहने लगे । फिर एक दिन ठाकुरों ने प्रार्थना की कि—कृपया अब आज्ञा करें, आपके लिये कुटिया किस स्थान पर बनवाई जाय । तब सुन्दरदासजी महाराज ने जिस पर्वत के नीचे घाटड़ा बसता है, तथा वर्तमान प्रहलादशाल के पश्चिम और दक्षिण में दो पर्वत शिखर पास ही पड़ते हैं. उनमें से पश्चिम के शिखर पर कुटिया बनाने की आज्ञा दी ।
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ठाकुरों ने कहा—बहुत अच्छा, अब वहां ही आपकी इच्छानुसार शीघ्र ही कुटिया बनवा दी जायगी । जब तक कुटिया तैयार नहीं हो तब तक आपकी रुचि हो तो यहां वा जहां आप कहें वहीं ही सेवा का सब प्रबन्ध हो जायगा । सुन्दरदासजी महाराज ने कहा— कुटिया तैयार होगी तब तक हम यहां ही ब्रह्म भजन करेंगे ।फिर धीरावत ठाकुरों ने उक्त पर्वत शिखर पर रहने योग्य अच्छी कुटिया बनवाने की योजना शीघ्रातिशीघ्र बनाकर कार्य आरंभ कर दिया ।
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प्रथम उस शिखर पर १२ फुट ऊंचा २५ फुट लम्बा और २० फुट चौड़ा पक्का चबूतरा बनवाया और उस चबूतरे पर दो कुटिया बनवाई, एक सुन्दरदासजी के लिये और दूसरी प्रहलाददासजी के लिये । कुटिया से लगभग २० गज दूर पर एक जलाशय = छोटी तलई बनवा दी गई जिस से पानी वहां मिलता रहे । जब आश्रम तैयार होकर सूख गया तब ठाकुरों ने प्रार्थना की महाराज ! आश्रम तैयार हो गया है । अब आपकी इच्छा हो तब ही पधार सकते हैं । वहां विराजेंगे तब भी सब प्रकार की सेवा जैसे यहां होती रही है वैसे ही वहां भी होती रहेगी । आपके ब्रह्म भजन में किसी भी प्रकार का विघ्न नहीं होने दिया जायगा ।
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सुन्दरदासजी महाराज की जिस दिन उक्त आश्रम में पधारने की आज्ञा हुई उस दिन वहां उत्सव मनाने की योजना बनाई गई और आसपास के भक्त लोग भी महाराज के आश्रम प्रवेश के महोत्सव में सत्संग के लिये आये । फिर उक्त शिखर के आश्रम में पधार कर दोनों संत निर्विघ्न ब्रह्म भजन करने लगे । घाटड़ा के धीरावत ठाकुर लोग सेवा का पूरा-पूरा ध्यान रखते थे । दोनों ही संत परम विरक्त थे । अतः एकान्त स्थान में निरंतर ब्रह्म भजन ही करते रहते थे । आसपास के प्रदेश के लोग उक्त आश्रम को सुन्दरदासजी प्रहलाददासजी की मैड़ी बोलते हैं ।
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चिरकाल तक उक्त आश्रम में दोनों संतों ने ब्रह्म भजन किया । (खादू में रायसिंह ने दादूजी पर हाथी छोड़ा था तव सुन्दरदासजी ने वहां प्रकट होकर रायसिंह को समझाया था ।) फिर वहां से सुन्दरदासजी महाराज विचरने लगे तव प्रहलाददासजी भी अपने गुरुदेव के साथ ही उस आश्रम से नीचे उतर आये । प्रहलाददासजी को सुन्दरदासजी द्वन्द्वपुरी में बैठा कर अचलागिरी जाने के लिये आगे चल दिये फिर धीरावत प्रहलादजी को घाटड़ा में ले आये । घाटड़ा ग्राम के धीरावतों की कोटड़ियों के पास ठहरकर वे भजन करने लगे । सुन्दरदासजी अन्यत्र पधार गये और प्रहलादजी को घाटड़ा में रहकर भजन करने की आज्ञा दे गये थे, अतः प्रहलाददासजी वहां ही रहे ।
(क्रमशः)

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