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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
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*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*साचा सतगुरु जे मिलै, सब साज संवारै ।*
*दादू नाव चढ़ाय कर, ले पार उतारै ॥*
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अपने पूर्व आश्रम के ज्येष्ठ भ्राता आमेर नरेश मानसिंह की प्रार्थना संत हरिदासजी ने मान ली । फिर दूसरे दिन राजकीय स्वागत सामग्री बाजे-गाजे आदि लेकर स्वयं राजा मानसिंह हरिदासजी को लाने गये और बड़ी धूम धाम के साथ संकीर्तन करते हुये नगर के मुख्य मार्ग से जनता को संतमंडल का दर्शन कराते हुये राजभवन में लाये और राठौड़ी राणी कनकावती के भवन में जहां पहले दादूजी महाराज भी कुछ दिन विराजे थे, उसी स्थान में ठहराया और सेवा का सुन्दर प्रबन्ध कर दिया । सेवक नियुक्त कर दिये व उन्हें आज्ञा दी कि जो भी संतों को चाहिये वह वस्तु तत्काल उपस्थित करो । फिर राज भवन में सत्संग आरंभ हो गया ।
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राज-परिवार के सभी नर-नारी सत्संग में भाग लेते थे । पर्दे में बैठने वाली माताओं के लिये इस प्रकार का चिक लगा दिया गया था जिससे उनको वक्ता का दर्शन होता रहे किन्तु वे किसी अन्य नर को नहीं दीख सकें । उस समय राघवदासजी दादू वाणी की कथा करते थे । वे सभी विषयों पर भक्त चरित्र रूप दृष्टान्त दे कर सभी विषयों को सर्वसाधारण के हृदय में अंकित कर देते थे । कारण- उनको भक्त चरित्र बहुत याद थे । राजभवन के नर नारियों पर इस सत्संग का भारी प्रभाव पड़ा ।
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अनेक नर नारियों ने इस सत्संग के प्रभाव में आकर अपने अखाद्य, अपेयों को छोड़ दिया था । भगवद् भजन में मन लगाया था । यह सत्संग बहुत अच्छा हुआ । इस सत्संग में सुन्दर वाणी के प्रवचन और हरिदासजी आदि उच्च कोटि के संतों के दर्शन प्रति दिन अनायास ही प्राप्त हो जाते थे । राज परिवार ने संतों की सेवा भी श्लाघनीय रूप से करी । इन्हीं दिनों में आमेर नरेश मानसिंह और आमेर राज्य परिवार के १२ सरदारों ने कहा- आज तक हम कछवाहाओं की १२ कोटड़ी कहलाती थी । अब से हम हरिदासजी की १३वीं कोटड़ी मानेंगे ।
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उन १२ सरदारों का परिचय वंशदीपिका में मंगलदासजी ने इस प्रकार दिया है-वीकानेर नरेश लूणकरण की पुत्री और आमेर नरेश पृथ्वीराज की पटराणी से १२ पुत्र हुये थे उनके नाम ये हैं । १ भीम, २ बलभद्र, ३ भारमल(ये आमेर के राजा हुये हैं), ४ सांगा, ५ सुरतारण, ६ संस्मल, ७ गोपाल, ८ पचायण, ९ चतुर्भुज, १० जगमाल, ११ रायमल, १२ लसधीर । जिस समय हरिदासजी की १३ वीं कोटड़ी नियत की गई उस समय उक्त सरदारों के वंशजों के ठिकाने थे—१ म्हार, २ बांसखोह, ३ नींदड़, ४ बाटका, ५ चौमू, ६ बगरू, ७ अचरोल, ८ सांमेर, ९ काल्हवाड़, १० स्याहीवाड़, ११ करैंडा, १२ नीमैड़ा । उक्त ठिकानों के सभी सरदारों ने एक स्वर से कहा—कि आज से हमारी १३ कोटड़ी कहलायेंगी ।
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कहा भी है—“बहुर मंडली ध्यान हरि आमेर सु आये ।
सांमेलाले सभा राय धनि धनि गुण गाये ॥
कोटड़ी सु दश दोय, ग्रामावती है कछवाहा ।
हरिदास भक्त, कोटड़ी तैरवीं ताहा ॥
सब मिल कुल तारन कहे, अशन वशन सेवा सरस ।
मंगल हरी हजूर हरि, कनकावती सु महल वस ॥१२॥ वं.प्र.
उक्त प्रकार आमेर राज परिवार के सरदारों ने हरिदासजी महाराज का श्रद्धा से बहुत सम्मान किया था ।
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राजा मानसिंह तो अपने प्रिय लघु भ्राता से ज्ञान गोष्टी करते ही रहते थे । कहा भी है—
युगल भ्रात गोष्टी करें, मान हरी सुख राश ।
कथा कीर्तन सुमिर हरि, सकल सभा हरि प्यास ॥४७॥ वं. प्र.
छप्पय—
हरी भ्रात के रमत, मान नृप शीश नमायो ।
सदा रहो गढ़ एक, गांव पच्चीस सुनायो ॥
हरी कह्यो हरि भजो, अटन करि है जन दर्शन ।
नृप मिल कह्यो विचार, श्याम इत राखो परसन ॥
श्याम चतुर केवल रखे, भूपत्ति भोजन द्वार पट ।
मंगल हृदयराम रवि भीख भोग ले किरंगि अट ॥४८॥ वं.प्र.
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आमेर से हरिदासजी विचरने का विचार करने लगे तब आमेर नरेश मानसिंह ने हाथ जोड़कर मस्तक नमाते हुये कहा—भगवन् ! जाने का विचार क्यों कर रहे हैं ? यहां ही बैठकर भजन कीजिये । यदि आप राज भवन में निवास नहीं करना चाहें तो आपके निवास के लिये आपकी इच्छानुसार एक गढ़ आप को भेंट कर दिया जायगा । उसमें निवास करते हुये अपने शिष्यों के सहित भजन करिये । आपके योग क्षेम के लिये पच्चीस ग्राम आपके भेंट कर दिये जायेंगे । उनकी आय से शिष्यों सहित आपका निर्वाह होता रहेगा तथा आपके पास आने वाले संतों व भक्तों का भी सत्कार होता रहेगा ।
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और भी समय २ पर आपकी सेवा में मैं तथा राज-परिवार के सरदार आते ही रहेंगे । आपको किसी भी प्रकार का विक्षेप नहीं होने दिया जायगा ।आप और आपके शिष्यों का साधन भजन निर्विघ्न चलता रहे । ऐसा ही प्रबन्ध कर दिया जायगा । अत: आप हम परिवार वालों के कल्याण के लिये आमेर राज्य की सीमा में ही विराजिये । यही हम परिवार वालों की प्रार्थना है । आशा है आप हम लोगों की प्रार्थना स्वीकार कर के हम सबको अवश्य कृतार्थ करेंगे ।
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आमेर नरेश मानसिंह की उक्त प्रार्थना सुनकर हरिदासजी महाराज ने कहा—राजन् ! तुम्हारा कहना तो ठीक ही है किन्तु हम तो संत दर्शन के लिये भ्रमण करेंगे यहां नहीं रहेंगे । अब हमको गढ़ तथा ग्रामों की आवश्यकता नहीं रही है । हमारा गढ़ संत समुदाय है । उसी में रहने से हमारी रक्षा होती है गढ़ मे नहीं । ग्राम तो सभी हमारे हैं । हमारा तो सभी देश है । पच्चीस ग्राम ही हम हमारे नहीं मान सकते । हम तो यथा लाभ में संतुष्ट रहते हैं । परमाचार्य दादूजी महाराज की वाणी तथा गुरुदेव प्रहलाददासजी की वाणी के विचार से अब हमारे मन में परम संतोष रहता है ।
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अब हम भोगों में सुख नहीं मानकर संतोष पूर्वक ब्रह्म भजन में सुख मानते हैं । आप लोगों का कल्याण तो हरि भजन से होगा । इतने दिन जो सत्संग किया है उसका मनन करते हुये हरि भजन करो । फिर राजा मानसिंह ने परिवार के सरदारों से मिलकर विचार किया कि हरिदासजी तो नहीं रहेंगे । अधिक आग्रह संतों से करना भी अच्छा नहीं है । अब हमें श्यामदासजी को यहां रखने की प्रार्थना करनी चाहिये । जिससे १३ वीं कोटड़ी भी बनी रहेगी । और श्यामदासजी का मिलन दर्शन तथा उपदेश का लाभ भी मिलता रहेगा ।
(क्रमशः)

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