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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ४९/५२*
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*कहि जगजीवन बंदगी१,नख सिख बिरह जगाइ ।*
*जे कोई करै सो ऊधरै, रांम ह्रिदै गुण गाइ ॥४९॥*
{१. बंदगी=विनय(प्रणति)}
जगजीवन साहब कहते हैं, सच्ची बंदगी१ क्या है । बंदगी का अर्थ आपने दिया है विनय, प्रणति । वह है नख से सिख तक, पूरे शरीर में बिरह को जगाना । जब तक रोम-रोम में परमात्मा के मिलने की विरह नहीं जागती, तब तक बंदगी अधूरी है । जो कोई ऐसी बिरह भरी बंदगी करे, वही ऊधरै, तर जाता है । वह हृदय में राम के गुण गाकर पार हो जाता है ।
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*कहि जगजीवन बेदबी२, गाफिल३ देह गंमार४ ।*
*हरि भजि पार न पहुँच ही, बीचि लगावै बार५ ॥५०॥*
{२. बेदबी=बेअदबी, अविनय(धृष्टता)} {३. गाफिल=असावधान} {४. गंमार=गँवार(अज्ञ) मूर्ख} (५. बार=बिलम्ब)
संत जगजीवन जी कहते हैं, बेदबी यानी बेअदबी, अविनय, धृष्टता, गाफिल यानी असावधान, गंमार यानी गँवार, मूर्ख । जो देह गंमार है, जो शरीर के अभिमान में गँवार बना हुआ है, जो हरि के प्रति बेअदबी२ करता है, गाफिल३ रहता है, वह हरि को भज कर भी पार नहीं पहुँचता, मूर्खता४ करता रहता है । वह बीच में ही बार५ लगाता है, यानी बिलम्ब करता है, अटक जाता है । अहंकार और असावधानी भक्ति में सबसे बड़ा रोड़ा है ।
*कहि जगजीवन तूं ही तूं, तुझ बिन और न कोइ ।*
*तूं ही सकल सब ठांम हरि, आदि अंत मधि जोइ ॥५१॥*
यह महावाक्य जैसी साखी है । संत जगजीवन जी कहते हैं, हे हरि, तूं ही तूं है, तुझ बिन और कोई नहीं है । सारे ठांम में, सब जगह तूं ही सकल रूप में है आदि में तूं, अंत में तूं, मध्य में भी तूं ही जोइ, दिखाई देता है । यह अद्वैत की अनुभूति है, जहाँ दूसरा कोई रहा ही नहीं ।
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*बेद भागवते६ देहुरा७, विप्र बिचार८ न देह ।*
*कहि जगजीवन नांम आचरण, हरिजन अलख बिदेह ॥५२॥*
(६. भागवते=भागवत महापुराण) (७. देहुरा=देवमूर्ति या देवालय) (८. विप्र बिचार=ब्राह्मणों का कर्मकाण्ड सम्बद्ध मत)
वेद, भागवत क्या बताता है, तो कहते हैं वेद, भागवत बिषै रस बताता है । प्रवृत्ति मार्ग में यह करो तो स्वर्ग मिलेगा, यह रस मिलेगा, ऐसे विषय रस का वर्णन करता है । तो वह क्यों मान्य किया जाए, वह तो बंधन में डालता है । संत जगजीवन जी कहते हैं, सच्चा प्रेम रस तो सतगुरु चवै, सतगुरु बताते हैं । जब सतगुरु के मुख से जस आइ, यानी यश आता है, हरि के प्रेम की बात आती है, वही सच्चा रस है ।
(क्रमशः)

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