रविवार, 1 नवंबर 2026

*राघवदासजी की शिष्य परम्परा*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*सूखा सहजैं कीजिये, नीला भांजे नांहि ।*
*काहे को दुख दीजिये, साहिब है सब मांहि ॥*
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*राघवदासजी की शिष्य परम्परा*
राघवदासजी की शिष्य परंपरा करौली में चली गई । राघवदासजी का स्थान उदेही से उठकर करौली चला गया । संभव है राघवदासजी के शिष्य सुखदेवदासजी ही करौली जा बसे होंगे । करौली के स्थान की स्थापना तो राघवदासजी के समय में हो गई थी किन्तु राघवदासजी उदेही भी आते थे और रहते थे । फिर भी उनकी परंपरा करोली की परंपरा ही मानी जाती है तो इस प्रकार है-१ राघवदासजी, २ सुखदेवदासजी, ३ कुंजदासजी, ४ राजारामजी, ५ नन्दरामजी, ६ हरिनारायणजी, ७ पुरुषोत्तमजी, ८ रामदासजी, ९ माधोदासजी, १० गोपालदासजी, ११ ज्ञानदासजी । २- सुखदेवदासजी भजनानन्दी महातमा थे तथा परम विरक्त थे ।
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*कुंजदासजी*
३- कुंजदासजी दादूवाणी में कथित निर्गुण ब्रह्म की उपासना करके महान् सिद्ध संत हो गये थे । उनके तप तेज से प्रभावित होकर तत्कालीन करोली नरेश ने एक ग्राम भी उनकी भेंट किया था जो राजस्थान के एकीकरण होने से पहले तक ‘कुंज’ के महन्तजी के अधिकार में था । कुंजदासजी ने करोली में अच्छा स्थान बनवाया था जो कुंजदासजी की कुंज नाम से करोली में प्रसिद्ध है । कुंजदासजी महान् सिद्ध संत तथा अति दयालु थे ।
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उनकी दया के विषय में एक जन श्रुति चलती है कि-एक दिन एक भक्त ने कुंजदासजी को एक इमली का हरा दांतुन लाकर दिया था । तब कुंजदासजी ने कहा- भाई ! हरा वृक्ष क्यों तोड़ लाये हो मेरा राम के दांत तो सूखी से ही साफ हो जाते हैं और हमारे परमाचार्य दादूजी महाराज ने सूखे दांतुन से दांत मुख साफ करने को कहा भी है—
‘सूखा सहजैं कीजिये, नीला भांजे नांहि ।
काहे को दुख दीजिये, साहिब है सब मांहि ॥’
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फिर कुंजदासजी महाराज ने सोचा-भक्त तोड़ तो लाया है, अब इसको सफल भी बनाना ही चाहिये । अतः कुंजदासजी ने उस दांतुन से अपने दांत साफ किये । फिर उस दांतुन को चीर कर जीभ साफ की और उन चीरे हुये दोनों टुकड़ों को वहां ही अलग भूमि में रोप दिया और प्रति दिन उनको पानी पिलाते रहे । वे हरे होकर शनैः शनैः दो वृक्ष बन गये । उन वृक्षों में सब लोग एक प्रत्यक्ष चमत्कार देखते थे कि-उनके फलों में आधा आधा बीज आता था । यह देखकर सब अति आश्चर्य करते थे और कहते थे यह कुंजदासजी महाराज की करामात है । वे दोनों वृक्ष कुंजदासजी महाराज की स्मृति चिरकाल तक कराते रहे किन्तु कुछ वर्षों पहले कुंज के महन्त ने किराये के लोभ में पड़कर उन वृक्षों के स्थान में दुकानें बनवाने के लिये उनको कटवा दिया और दुकानें बनवा दीं ।
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उक्त घटना से कुंजदासजी महाराज की योग शक्ति और दयालुता का परिचय मिलता है ।
भक्त जनों में दया की, अतिशयता दिखलाय ।
दांतुन करके फेरि भी दीन्हे वृक्ष लगाय ॥
कुंजदासजी महाराज के जीवन की विशेष घटनायें उनके स्थान में कोई जानकार व्यक्ति नहीं मिलने से नहीं मिल सकीं किन्तु यह तो प्रसिद्ध ही है कि वे महान् सिद्ध संत हुये हैं । तब ही उस देश के राजा तथा प्रजागण उनसे प्रभावित हुये थे । कुंजदासजी महाराज करोली में ही ब्रह्मलीन हुये हैं । उनकी समाधि कुंज में ही एक छत्री में है । समाधि की चरण चौकी में वि. सं. १७५२ अंकित है । पूजा प्रति-दिन होती है । कोई ब्राह्मण वेतन द्वारा करता है । कुंज की आय से वेतन मिलता है । पानी डालकर घिसने आदि से मास तिथि के अक्षर बिगड़ गये हैं । समाधि की छत्री लाल पत्थर की अच्छी बनी हुई है ।
(क्रमशः)

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