रविवार, 1 नवंबर 2026

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ७३/७६*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ७३/७६*
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*तेज पुंज निरबासनां८, नाद सक्ति गुन बास ।*
*जस भासै तस प्रकासै, सु कहि जगजीवनदास ॥७३॥*
{८.निरबासनां=निष्काम(कामनारहित)}
परमात्मा तेज का पुंज है और वह निष्काम है, उसमें कोई वासना नहीं । नाद उसकी शक्ति है और सब गुण उसी में वास करते हैं । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, जैसा जिसके हृदय में भास होता है, भाव होता है, वैसा ही उसे वह प्रकाशित होता है । निर्मल हृदय को वह तेज पुंज रूप में दिखता है ।
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*मन मारुत माथि रांम कहि, मारि मारि मर जांणि ।*
*कहि जगजीवन मिलि रहै, पूरण ब्रह्म पिछांणि ॥७४॥* 
मन पवन के समान चंचल है, उसे मथ कर, मार-मार कर मार डालो, अर्थात वश में कर लो, तब जाकर मरना सार्थक होगा । संत जगजीवन साहेब कहते हैं, इस प्रकार मन को मार कर जो पूर्ण ब्रह्म को पहचान लेता है, वह उसी में मिल कर रह जाता है, फिर उसका जन्म-मरण छूट जाता है ।
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*अरथ१ निरंतर भगति हरि, अनरथ२ बिषै बिलास ।*
*जे जन भाव सुझाव सोइ, सु कहि जगजीवनदास ॥७५॥*
{१. अरथ=(हितकर)}  (२. अनरथ=अहितकर)
हितकर तो केवल एक ही है, निरंतर हरि की भक्ति, और अहितकर है विषयों में विलास करना । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, जो जन इस भाव को समझ लेता है, सुझाव को हृदय में धर लेता है, वही सच्चा भक्त है ।
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*आदि निरंजन अंत हरि, मद्धि रांम सब ठांम ।*
*कहि जगजीवन निरखि निज३, सहज सरै सब काम ॥७६॥*
(३. निरखि निज=स्व स्वरूप को पहचानने से)
आदि में वही निरंजन है, अंत में वही हरि है, और मध्य में भी सब ठौर वही राम ही रमा है । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, अपने निज स्वरूप को निरख लेने से, पहचान लेने से, सहज ही सब काम संवर जाते हैं, सिद्ध हो जाते हैं । आत्मज्ञान से ही परमात्मज्ञान होता है ।
(क्रमशः) 

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