बुधवार, 4 नवंबर 2026

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ८५/८७*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ८५/८७*
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*कहि जगजीवन निरजला, बरष दिवस मंहि एक ।*
*हरि के कारण हरि भगति, अैसी करैं अनेक ॥८५॥*
संत जगजीवन साहेब कहते हैं, सच्चा निर्जला तो वर्ष में एक दिन नहीं, प्रतिदिन है । हरि के कारण, हरि की भक्ति के लिए भक्त ऐसी अनेक साधनाएं करते हैं । अर्थात निर्जला केवल एकादशी का व्रत नहीं, हर दिन मन को विषय-जल से निर्जल रखना ही सच्ची हरि भक्ति है ।
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*कहि* जगजीवन दार कौ, ब्रिषभ न खैंचे भार* ।*
*रांम सुमीर जन ऊधरै, जगजीवन बिसतार ॥८६॥*
(*-*. काष्ठनिर्मित बैल गाड़ी को कभी नहीं खींच सकता)
आपने बहुत सुंदर टिप्पणी की है, काठ से बना बैल कभी गाड़ी का भार नहीं खींच सकता । वैसे ही केवल बाहरी जड़ साधनों से भवसागर पार नहीं होता । संत जगजीवन दास जी विस्तार से कहते हैं, राम को सुमिर कर ही जन का उद्धार होता है । सजीव राम नाम ही गाड़ी खींचेगा, निर्जीव साधन नहीं ।
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*कहि* जगजीवन अस्म को, अस्व कोय घडि घात ।*
*अराभष बाजी अलाप धी, हरि बिन कटै न बाट* ॥८७॥*
{*-*. पत्थर के बने घोड़े से कोई मूर्ख(=अल्पधी) ही यात्रा करने की सोच सकता है}
जैसा आपने लिखा, पत्थर के बने घोड़े से कोई मूर्ख ही यात्रा करने की सोचेगा । वैसे ही हरि बिना यह जीवन की बाट, यह रास्ता कटने वाला नहीं है । संत जगजीवन साहेब कहते हैं, जो अल्प बुद्धि वाले हैं, वे नश्वर साधनों को, पत्थर के घोड़े को ही सच्चा मान बैठते हैं और हरि नाम रूपी सजीव घोड़े को भूल जाते हैं ।
॥ इति भ्रम विध्वंस कौ अंग संपूर्ण ॥
(क्रमशः)

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