मंगलवार, 3 नवंबर 2026

*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~२९/३२*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~२९/३२*
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*रज्जब अज्जब काम है, साधु जन संसार ।*
*जिन मिलते मोहन मिलैं, प्राणपुरुष ह्वै पार ॥२९॥*
संसार में संत जनों का कार्य अद्भुत देखा जाता है, जिसके संग से प्राणधारी पुरुष संसार-सागर से पार होकर विश्व-विमोहन ब्रह्म में ही मिल जाता है ।
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*रज्जब अज्जब रूप, साधु जन संसार मधि१ ।*
*जेहिं मिल मिलहिं अनूप, सकल बोल कारज सिधि२ ॥३०॥*
संसार में१ संत जनों का स्वरूप अद्भुत है, उनके सभी वचन जीव के कार्य को सिद्ध२ करने वाले होते हैं और जिनके सङ्ग से उपमा रहित परमात्मा भी मिल जाते हैं ।
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*असंख्य१ लोक आतम फिरे, तो भी साधु न होय ।*
*जन रज्जब सत्सङ्ग बिन, सीझया२ सुन्या न कोय ॥३१॥*
जीवात्मा अनन्त१ लोकों में फिर आवे, तो भी साधु नहीं हो सकता, संसार में सत्सङ्ग के बिना कोई भी ज्ञानी२ हुआ हो ऐसा नहीं सुनने में आता ।
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*भाव भक्ति सत जत जुदे, अंग१ न आवहिं अंग२ ।*
*रज्जब रीती३ आतमा, एक बिना सत्संग ॥३२॥*
भाव, भक्ति, सत्य भाषण, ब्रह्मचर्य आदि भिन्न भिन्न साधन करने से प्रिय१तम ब्रह्म अभेद रूप से अपने शरीर२ में नहीं आता अर्थात आत्मा और ब्रह्म की एकता का ज्ञान नहीं होता । वह तो सत्सङ्ग से ही होता है । अत: सत्सङ्ग के बिना जीवात्मा आत्म-ज्ञान रहित होने से खाली३ ही माना जाता है ।
(क्रमशः)

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