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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*५०. चाणेक कौ अंग १/४*
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*ठांम ठिकाणां बाहिरा, ठंठपाल२ किस कांम ।*
*जगजीवन ठाठा सबद, ठिक सौं कहै न रांम ॥१॥*
(१. चाणेक=चाणक्य=कोरड़ा, चाबुक) (२. ठंठपाल=सूखी डाल और पत्तियों वाला वृक्ष=ठूंठ) (स्थूणा)
इस साखी में संत जगजीवन जी महाराज उन लोगों के विषय में बता रहे हैं, जिनका कोई ठांम-ठिकाना नहीं है । ठांम-ठिकाना का अर्थ है, सच्चे सद्गुरु का आश्रय, संतों की संगति और भजन की दृढ़ भूमिका । जिसके जीवन में यह ठौर नहीं है, वह ठंठपाल अर्थात् ठूंठ पेड़ के समान है, जिसमें न हरियाली है, न छाया है, न फल है । जगजीवन जी कहते हैं, ऐसे लोग केवल ठाठा सबद अर्थात् दिखावे के बड़े-बड़े शब्द बोलते हैं, ज्ञान की ऊँची-ऊँची बातें करते हैं, परन्तु ठिक सौं अर्थात् सच्चे हृदय से प्रेम से राम नाम नहीं कहते । जहाँ राम नाम हृदय से नहीं है, वहाँ सारा ठाट-बाट व्यर्थ है ।
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*भीतर टोटा३ भजन का, बोलै बोल कुबोल४ ।*
*जगजीवन जिव आपणां, आप करावै मोल ॥२॥*
{३. टोटा=घाटा(=कमी)} (४. कुबोल=अपशब्द)
यहाँ महाराज जी कारण और कार्य का सम्बन्ध बता रहे हैं । जब भीतर भजन का टोटा है, अर्थात् हृदय में राम नाम की पूंजी की कमी है, तो बाहर वाणी में कुबोल ही निकलते हैं । भीतर की शून्यता ही बाहर अपशब्द, निन्दा, कठोरता के रूप में प्रकट होती है । भजन ही वाणी को पवित्र करता है । संत जगजीवन जी कहते हैं, ऐसा जीव अपना मोल आप ही कराता है, अर्थात् जैसा बोलेगा, वैसा ही संसार उसका मूल्य आंकेगा । मीठा बोलेगा तो आदर पायेगा, कड़वा बोलेगा तो स्वयं ही अपना अपमान करा लेगा ।
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*कहि जगजीवन रांमजी, बंबई५, साकत मुख५ ।*
*बांणी सुध६ न ऊचरै, ताथैं पावै दुख ॥३॥*
{५-५. बंबई-बांबी(सांप का बिल)} {साकत मुख=शाक्तमुख(दुष्ट मुख या दुर्मुख)} {६. सुध=शुद्ध, स्पष्ट या पवित्र(शुभ)}
इस साखी में दो बहुत सुन्दर उपमायें दी गई हैं, बंबई और साकत मुख । बंबई अर्थात् सांप की बांबी, जो भीतर से विष से भरी और अंधेरी होती है । साकत मुख अर्थात् शाक्त या दुर्जन का मुख, जो सदा दूसरों को दुःख देने के लिए ही खुलता है । संत जगजीवन जी रामजी को साक्षी करके कहते हैं, जिसका मुख बांबी जैसा और दुर्जन जैसा बना हुआ है, उसके मुख से सुध बांणी अर्थात् शुद्ध, पवित्र, हितकारी वाणी कभी नहीं निकलती । उसकी वाणी में सदा दोष, छिद्र, विष ही रहता है, और उसी कारण से वह जीवन भर दुःख पाता है ।
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*काकबचन७ कायादहण८, निरमल९ बचन निवास ।*
*बिष अम्रित दोउ रसन मैं, सुकहि जगजीवनदास ॥४॥*
(७. काकवचन=कौए के समान कठोर वाणी) (८. कायादहण=शरीर में जलन पैदा करने वाली) {९. निरमल=मलरहित(शुद्ध)}
इस साखी में महाराज जी वाणी के दो रूपों का फल बता रहे हैं । काकबचन अर्थात् कौए के समान कर्कश, कड़वे वचन, ये कायादहण हैं, अर्थात् सुनने वाले के शरीर और मन में जलन पैदा कर देते हैं, जैसे आग लगा दी हो । इसके विपरीत निरमल बचन अर्थात् मलरहित, शुद्ध, मधुर, सत्य वचन, ये हृदय में निवास अर्थात् शांति का घर बना देते हैं । संत जगजीवनदास जी बहुत विचार करके, सुकहि अर्थात् अच्छी तरह विचार करके कहते हैं, देख लो, विष और अमृत दोनों इसी एक रसना अर्थात् जीभ में रखे हुए हैं । चाहो तो विष बाँटकर सबको जलाओ, चाहो तो अमृत बाँटकर सबको शीतल कर दो ।
(क्रमशः)

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