🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू माला तिलक सौं कुछ नहीं, काहू सेती काम ।*
*अन्तर मेरे एक है, अहनिशि उसका नाम ॥*
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परशुरामजी ने जब जाना कि ये दादूजी के शिष्य हैं, तब पुजारी को बुलवाकर उसे कहा — अभी जो भगवान् के जलेबियों का भोग लगाया था उसमें से एक व्यक्ति की खुराक जितना प्रसाद ला दो । पुजारी ने तत्काल ला दिया । तब परशुरामजी महाराज ने कहा — संतजी ! अभी पंक्ति में देर है, अतः यह प्रसाद पालो । जग्गाजी ने परशुरामजी की आज्ञा मानकर वह प्रसाद पा लिया । फिर परशुरामजी ने पूछा — संतजी ! आपके गुरुजी ने आपको क्या मंत्र दिया है ? और अपने मत का स्वरूप क्या बताया है ?
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जग्गाजी ने कहा — हमारे गुरुजी सत्यराम बोलते हैं और निरंतर जप करने के लिये ‘राम’ मंत्र बताते हैं । जप की विधि इस प्रकार बताते हैं —
“मन मनका कर इवासा धागा, सुरति निरति से पोय सभागा ।
त्रिपुटी स्थिर कर ध्यान बताया, अजपा जाप इसी विधि गाया ॥
हो निर्वैर विकार विहावे, झूठ कपट निन्दा नहिं भावे ॥”
‘आत्माराम अविनाशी कृत “दादूचतुर्युगलीला” ग्रंथ के कलियुग लीला दशम प्रभाव के जग्गाजी के उक्त वचन सुनकर परशुरामजी प्रसन्न हुये किन्तु फिर बोले — ‘सत्यराम’ तो शिरोमणि मंत्र है ही किन्तु दादूजी का मत भी कुछ विलक्षणता रखता है और मुझे अपनी साधन शक्ति से ज्ञात होता है कि दादूजी का शिष्य समुदाय बहुत बढ़ेगा और वह एक संप्रदाय का रूप धारण कर लेगा । इससे उसका कोई भिन्न मंत्र भी होना ही चाहिये ।
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तब जग्गाजी ने कहा — ये आपके वचन मैं दादूजी महाराज को कहूँगा, फिर वे कोई भिन्न मंत्र बतायेंगे तो, हम लोग उसको गुरु मंत्र कहा करेंगे । आपकी द्वितीय बात मत के स्वरूप संबंधी है, सो तो हमारे गुरुदेव संक्षेप से बताते हैं ।
आप सुनें —
“आपा मेटे हरि भजे, तन मन तजे विकार ।
निरवैरी सब जीव से, दादू यह मत सार ॥”
सर्व प्रकार के अहंकार को मिटाकर निरंतर हरि का भजन करना, शरीर तथा मन के विकारों को त्यागना, सर्व प्राणियों से निरवैर रहना अर्थात् वैर न करके सब पर दया ही करना । यही संपूर्ण धार्मिक संप्रदायों का सार तत्व है, सोई हमारा मत है । दादूजी की उक्त साखी सुनकर परशुरामजी अति प्रसन्न हुये ।
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इस प्रकार विचार करते २ पंक्ति का समय हो गया और भगवान् के भोग आ गया । भोग लग जाने पर तथा पंक्ति लगाने का संकेत होने पर परशुरामजी ने पंक्ति के प्रबन्धक को बुलवाकर कहा — ये संत दादूजी के शिष्य हैं । इनको पंक्ति में ले जाओ, इनसे भेद भाव मत रखना, अच्छी प्रकार प्रेम से जिमा देना । परशुरामजी महाराज के पास तो पंक्ति के प्रबन्धक ने कुछ नहीं कहा किन्तु उनके मन में भेद भाव ही बना रहा । वे मन में सोचने लगे — दादू तो माला, तिलक आदि वैष्णवों के कुछ भी चिन्ह नहीं रखते, न मूर्ति पूजा ही करते हैं, सबको समान ही समझते हैं । उनके शिष्य को हम पंक्ति में कैसे बैठा सकते हैं ? ठीक है महाराज ने कहा है तो भोजन करा सकते हैं ।
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वे जग्गाजी को ले गये और जहां बर्तन मांजा करते थे वहां ले जाकर कहा — यहां बैठजा । जग्गाजी तो उच्च कोटि के संत थे । उन्हें मान अपमान का तो कोई विचार नहीं था । इससे वे वहां ही बैठ गये । फिर उनको भोजन करने के लिये एक फूटी हुई हँडिया का ठीकरा दिया और भोजन भी भेद भाव रखकर ही परोसा । जब जीमने लगे तब जग्गाजी ने सोचा — स्थान, पात्र आदि सब कुत्ते के योग्य हैं । अतः मुझे कुत्ते के रूप में ही जीमना चाहिये ।
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फिर जग्गाजी तो संकल्प सिद्ध महात्मा थे, सब को कुत्ते के रूप में भासने लगे और सब पंक्ति में प्रत्येक साधु को दूसरे की थाली में कुत्ता खाता हुआ दीखने लगा । इससे सब एक साथ कहने लगे तेरी थाली में कुत्ता खाता है, तेरी थाली में कुत्ता खाता है । इस प्रकार कोलाहल होने लगा । उसको सुनकर परशुरामजी आये और बोले — क्यों इतना कोलाहल कर रहे हो ? तब प्रत्येक साधु ने कहा — उसकी थाली में कुत्ता खाता है, उसकी थाली में कुत्ता खाता है ।
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यह सुनकर परशुरामजी महाराज ने पूछा — वे दादूजी के शिष्य संत कहां हैं ? साधुओं ने कहा — वह भी नहीं हैं, उसके स्थान में एक कुत्ता खा रहा है । फिर परशुरामजी उस स्थान पर गये, वहाँ राख फैली हुई थी । वह बर्तन मांजने का स्थान था । जग्गाजी को दिये हुये ठीकरे में एक कुत्ता निडर होकर खा रहा था । उसे देखकर परशुरामजी समझ गये कि इन मूर्खों ने सन्त के साथ अनुचित व्यवहार किया है । इसी से यह लीला उन संतजी ने ही दिखायी है । कहा भी है —
पांति भेद कर संत से, होता है उपहास ।
परशुराम के जग्गा का, करत श्वान सब पास ॥३३॥ ह. त. ११
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फिर परशुरामजी उस कुत्ते की ओर मुख करके बोले — संतजी ये लोग तो मूर्ख हैं और केवल साम्प्रदायिक अभिमान से ही अन्धे हो रहे हैं । आपने इनका अभिमान नष्ट करने के लिये जो कुछ किया है सो अच्छा ही किया है किन्तु अब अपनी लीला को समेट लीजिये । इतना कहते ही जग्गाजी अपने रूप में भासने लगे । फिर तो तत्काल सब कुत्ते अन्तर्धान हो गये । यह देखकर सब लज्जा से नत मस्तक हो गये कुछ भी नहीं बोल सके । फिर परशुरामजी ने कहा — तुम लोग किसी संत को नहीं पहचान सको तो मेरे कहने पर तो मान लिया करो किन्तु अपने अभिमान में निमग्न रहने से मेरी बात भी नहीं सुनते ।
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ये परम संत दादूजी के शिष्य हैं, इसलिये सरल स्वभाव होने से यह साधारण लीला ही दिखाकर रह गये और कोई होता तो कुछ अन्य उपद्रव भी कर सकता था । फिर जग्गाजी परशुरामजी को तथा सब संतों को प्रणाम करके वहां से चले आये । यह समाचार सहसा ग्राम में भी फैल गया था । जग्गाजी जिस वैश्य के वस्त्र लाये थे, उसके पास गये तब ग्राम के नर-नारी दौड़ दौड़कर मार्ग पर जग्गाजी के दर्शन करने आ रहे थे । वैश्य के वस्त्र देकर तथा अपने वस्त्र पहन कर जग्गाजी मोरड़ा का मार्ग पूछकर मोरड़ा को चल दिये ।
(क्रमशः)

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