शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

*५०. चाणेक कौ अंग ५/८*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*५०. चाणेक कौ अंग ५/८*
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*हरि थैं बिमुख सरीर सौं, कहो प्रभु को नहिं नांम ।*
*कहि जगजीवन मिल रहै, सो मति१ दीजै रांम ॥५॥*
{१. मति=नहीं(निषेध)}
इस साखी में संत जगजीवन जी महाराज भगवान् से एक बहुत ही मार्मिक प्रार्थना कर रहे हैं । वे कहते हैं, जो शरीर हरि से बिमुख है, अर्थात् जिसने भगवान् से मुख मोड़ लिया है और जो प्रभु का नाम तक नहीं कहता, ऐसे शरीर धारी जीव से हे प्रभु, मुझे कभी मिलना न पड़े । जगजीवन जी कहते हैं, हे राम, ऐसी मति अर्थात् ऐसी संगति मुझे मत दीजिये । भाव यह है कि भजनहीन व्यक्ति की संगति भी हमारे भजन को नष्ट कर देती है, इसलिए संत सदा यही मांगते हैं कि हमें कुसंग से बचाये रखना ।

*कहि जगजीवन रांम तजै रस, मन सुभाव तन जाइ ।*
*आंख सदा फल पर रहै, ऊँट कटेरा२ खाइ ॥६॥*
(२. कटेरा=ऊँट की फल खाने की इच्छा कितनी ही प्रबल क्यों न हो, परन्तु वह स्वभाववश काँटे ही खाता है) 
यहाँ महाराज जी जीव के स्वभाव की एक अद्भुत उपमा देते हैं । वे कहते हैं, जीव राम रूपी रस को तज देता है, अर्थात् भगवान् के प्रेम के मीठे रस को छोड़ देता है, और मन के सुभाव से तन इधर-उधर भटक जाता है । इसकी दशा उस ऊँट जैसी है, जिसकी आंख सदा आकाश में लगे मीठे फल पर रहती है, परन्तु स्वभाववश वह नीचे पड़े हुए कटेरा अर्थात् काँटे ही खाता रहता है । इसी प्रकार जीव चाह तो अमृत फल रूपी राम प्रेम को रहा है, परन्तु आदत के कारण विषयों के काँटे ही खाता रहता है । फल की इच्छा रखते हुए भी काँटा खाने का स्वभाव नहीं छूटता, यही जीव की सबसे बड़ी विडम्बना है ।
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*कहि जगजीवन रांमजी, सठ हठ मठ मंहि मार ।*
*आदि अलख भरतार तजि, जार करै विभिचार३ ॥७॥*
{३. विभिचार=व्यभिचार(सम्भोग)}
इस साखी में बहुत कठोर शब्दों में जीव की मूर्खता पर चोट की गई है । सठ अर्थात् शठ, मूर्ख जीव, हठ करके मठ में ही अपनी शक्ति को मार रहा है, अर्थात् हठयोग आदि बाहरी साधनों में शरीर को कष्ट दे रहा है । परन्तु आदि अलख भरतार अर्थात् सबके आदि पति, अलख अविनाशी परमात्मा को तज कर, वह जार से व्यभिचार कर रहा है । यहाँ जार का अर्थ है माया रूपी विषय । जैसे कोई स्त्री अपने सच्चे पति को छोड़कर जार पुरुष के संग व्यभिचार करे, वैसे ही जीव अपने सच्चे स्वामी राम को छोड़कर विषय रूपी जार के साथ रमण कर रहा है । यह आध्यात्मिक व्यभिचार है, जो जीव को नीचे गिरा देता है ।
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*कहि जगजीवन रांमजी, दालिद्द४, दुख ही पाइ ।*
*प्रेम भगति रस भूल करि, बिषिया५ सौं लपटाइ ॥८॥*
{४. दालिद्द=दारिद्रय(निर्धनता)}   (५. बिषिया=विषय भोग) 
संत जगजीवन जी कहते हैं, हे रामजी, जो जीव प्रेम भगति के रस को भूल कर बिषिया अर्थात् विषय-भोगों से लपटाइ अर्थात् लिपट जाता है, वह दालिद्द अर्थात् दारिद्रय को ही प्राप्त होता है । यह दारिद्रय केवल पैसे का नहीं, बल्कि प्रेम का, शांति का, आनंद का दारिद्रय है । विषयों से लिपटने पर हाथ में दुःख के सिवा कुछ नहीं आता । जिस प्रकार आग से लिपटने पर जलन ही मिलती है, वैसे ही विषयों से लिपटने पर जीव को दुःख और दरिद्रता ही मिलती है, और वह सच्चे धन रूपी प्रेम भक्ति से वंचित रह जाता है ।
(क्रमशः)

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