मंगलवार, 3 नवंबर 2026

*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~२५/२८*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~२५/२८*
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*परम पुरुष पारस परसि, साधु सोना होय ।*
*तो रज्जब सत्संग सौं, मिलत न वरजो कोय ॥२५॥*
पारस से स्पर्श पर लोहा सोना हो जाता है, वैसे ही सत्संग में जाने से ध्यानादि द्वारा परम पुरुष परमात्मा से मिलकर साधारण प्राणी भी संत हो जाता है, अत: सत्संग में जाकर संतों से मिलने वाले को कोई न रोके ।
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*साधु वाणी छाँह हमाई१, भाग हुं पड़े शीश पर आई ।*
*देखत दोन्य पाँवहि राज, रज्जब होहिं सकल शिर ताज ॥२६॥*
संतों की वाणी कान में और हमा१ पक्षी की छाया शीश पर बने भाग्य से ही पड़ती है, जिसके शिर पर हमा पक्षी की छाया पड़ती है वह राजा हो जाता है और जिसके कानों में संतों की वाणी पड़ती है वह सकल शिरोमणी आत्म राज्य ब्रह्म पद को प्राप्त होता है । देखते देखते वर्तमान शरीर में ही दोनों महाराज पद को प्राप्त हो जाते हैं ।
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*साधु संदल१ पारस पारा, भृंगी छाँह हमाय२ ।*
*रज्जब मन तन पलटणों, भागहुं मिलहि सु आय ॥२७॥*
साधु, चन्दन१, पारस, पारा भृंगी और हमा२ पक्षी की छाया, इनका संयोग मन और शरीर दोनों को बदलने वाला है तथा बड़े भाग्य की प्रेरणा से ही आकर ऐसा संयोग मिलता है । साधु संग से शरीर संयम और मन में ज्ञान रूप परिवर्तन होता है, चन्दन से पृक्ष का गंध और गुण और आकार बदलता है । पारस से लोह का मूल्य और रंग बदलता है । पारा से औषधि रसायन रूप में बदल जाती है । भृंगी से कीट का आकार और स्वभाव बदलता है । हमा पक्षी की छाया से भाग्य और भेष बदलता है ।
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*हद१ बेहद२ के बीच में, साधु३ संत दलाल ।*
*सौदा४ आतम राम सौं, इन करि ह्वै दर५हाल६ ॥२८॥*
मायिक संसार१ और ब्रह्म२ के बीच में श्रेष्ठ३ संत ही दलाल है, इनके द्वारा ही आत्म का राम से मिलन रूप व्यापार४ वर्तमान६ में५ ही हो जाता है ।
(क्रमशः)

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