॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= मन का अंग १० =*
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*तन में मन आवै नहीं, निशदिन बाहर जाइ ।*
*दादू मेरा जीव दुखी, रहै नहीं ल्यौ लाइ ॥७३॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जो यह मन है, सो अन्तर्मुखी नहीं होता है और विषियों में ही अनुरक्त हो रहा है । प्रभु स्मरण में लय नहीं लगाता है, इसी से हमारा चित्त अति दुःखी है ॥७३॥
तन तैं मन बाहर फिरै, हरि सुमिरण किम होइ ।
’जगन’ न जानै जगत ये, हरिजन कूँ दुख दोइ ॥
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*तन में मन आवै नहीं, चंचल चहुँ दिशि जाइ ।*
*दादू मेरा जीव दुखी, रहै न राम समाइ ॥७४॥*
टीका - हे जिज्ञासु ! यह मन स्वरूपाकार नहीं होता है, और विषयों में ही भ्रमता रहता है । तीन लोक और चौदह भवन के सम्पूर्ण मायिक पदार्थों में आसक्त हो रहा है । इसी से परमेश्वर के भक्त इस मन से दुखी रहते हैं, क्योंकि यह राम में समा कर नहीं रहता ॥७४॥
चंचल हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥(गीता)
हटकि - हटकि मन राखत जु छिन - छिन,
सटकि - सटकि चहुँ ओर दिसि जात है ।
लटकि - लटकि ललचाइ लोल बार - बार,
गटकि - गटकि कर विष - फल खात है ॥
झटकि - झटकि तार तोरत, करमहीन,
भटकि - भटकि कहुँ नेकु न अघात है ।
पटकि - पटकि सिर ‘सुन्दर’ जु मानी हार,
फटकि - फटकि जाइ सूधो कौन बात है ॥
छन्द -
इंद्रिनि के सुख चाहत है मन,
लालच लागि भ्रमैं सठ यूं ही ।
देखि मरीचि भर्यो जल पूरन,
धावत है मृग मूरख ज्यूं ही ॥
प्रेत पिशाच निशाचर डोलत,
भूख मरै नहिं धापत क्यूं ही ।
वायु बघूरहि कौन गहै कर,
सुन्दर दोरत है मन त्यूँ ही ॥
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*कोटि यत्न कर कर मुये, यहु मन दह दिशि जाइ ।*
*राम नाम रोक्या रहै, नाहीं आन उपाइ ॥७५॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! परमेश्वर का निष्काम स्मरण छोड़ कर संसारीजन अनेक बहिरंग साधनों में लगे रहते हैं, परन्तु उनसे मन एकाग्र नहीं होता, क्योंकि सकाम कर्म करते हैं । अथवा साधक पुरुष कहते हैं कि हे गुरुदेव ! इस मन को रोकने के लिए हमने बहिरंग प्रयत्न बहुत किये और प्रयत्न करते - करते शरीर कृश हो गया । उत्तर - हे साधक ! इस मन को निग्रह करने के लिये एक राम - नाम का स्मरण ही उत्तम साधन है, अन्य नहीं है ॥७५॥
अस्य संसारवृक्षस्य सर्वोपद्रवदायिन: ।
उपाय एक एवास्ति मनस: स्वस्य निग्रह: ॥
अध्यात्मविद्याधिगम: साधु - संगम एव च ।
वासना - संग - परित्याग:
प्राणस्पन्दनिरोधनम् ॥
(वाशिष्ठ)
(क्रमशः)

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