*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= मन का अंग १० =*
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*जब लग यहु मन थिर नहीं, तब लग परस न होइ ।*
*दादू मनवा थिर भया, सहज मिलैगा सोइ ॥१३॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जब तक मन राम के स्मरण में स्थिर नहीं होता है, तब तक यह परमेश्वर का साक्षात्कार नहीं कर पाता और जब यह मन साधनों के द्वारा हृदय में स्थित होगा, तो परमेश्वर इसको सहज में ही प्राप्त हो जाएगा ॥१३॥
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*दादू बिन अवलम्बन क्यों रहै, मन चंचल चल जाइ ।*
*सुस्थिर मनवा तो रहै, सुमिरण सेती लाइ ॥१४॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! यह मन बिना साधनों के साधे स्थिर नहीं रहता, क्योंकि मन रजोगुण प्रधान होने से चंचल स्वभाव वाला है । यह मन स्थिर तब तो रह सकता है, जब इसको अन्तर्मुख नाम - स्मरण में लगावें ।
साध भूत दियो सेठ को, टहल करन के काज ।
बांस मंगाय गड़ाइयो, बड़ो काज यह आज ॥
दृष्टांत - एक साहूकार के यहाँ महात्मा ठहरे । महात्मा की साहूकार ने खूब सेवा की । जाते समय महात्मा अपने पास जो भूत था, उसको सेवा के लिए सेठ को दे दिया और भूत को बोले - मनुष्य रूप से तूं सेठ का सब काम करना ठाली नहीं रहना । महात्मा रम गए । भूत मनुष्य रूप से सेठ को बोला - "काम बताओ ।" सेठ का बताया हुआ काम दिनों का काम घंटों में, घंटों का काम मिनटों में और मिनटों का काम सैकिन्डों में करने लगा । सेठ का सम्पूर्ण काम कुछ दिनों में ही पूरा कर दिया । फिर सेठ को बोला - काम बतलाओ । सेठ - "काम तो अब कुछ है नहीं ।" भूत बोला - मैं तुम्हारी पिटाई करूँगा, मुझे गुरु महाराज का उपदेश है कि ठाली मत रहना । बनिया अगम बुद्धि था । बोला - "एक बांस ला । बांस लाकर इसको गाड़ दे । इस पर चढ़ और उतर ।" भूत ने एक दो ऊपर नीचे चक्र काटे । फिर सोचा, इस काम का तो अन्त ही नहीं है । सेठ के चरणों में नतमस्तक हो गया । दृष्टांत में मन रूप भूत को गुरुदेव ने जीव रूप सेठ को सौंपा । जीव रूप सेठ ने बहिर्मुख होते मन को श्वास रूपी बांस पर राम - नाम का स्मरण रूपी काम बतलाया कि उठते श्वास और बैठते श्वास, राम - नाम का स्मरण कर अथवा "सोहं" का जाप कर । तभी मनरूपी भूत एकाग्र होने लगा । "ठाली मन तो शैतान का घर होता है ।"
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*सतगुरु चरण शरण चलि जांहीं,*
*नित प्रति रहिये तिनकी छांहीं ।*
*मन स्थिर करि लीजै नाम, दादू कहै तहाँ ही राम ॥१५॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! सतगुरु के तेजपुंज रूपी चरणों की शरण हृदय में ग्रहण करो और प्रतिदिन उनके बताये हुए उपदेश से मन को स्थिर करके व्यापक चैतन्य राम का भीतर ही साक्षात्कार करो । आप कहोगे, वहीं राम प्रत्यक्ष प्रकट होंगे ॥१५॥
प्रशान्तमनसं ह्योनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥(गीता)
(क्रमशः)

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