*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= मन का अंग १० =*
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*हरि सुमिरण सौं हेत कर, तब मन निश्चल होइ ।*
*दादू बेध्या प्रेम रस, बीष न चालै सोइ ॥१६॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! राम - नाम के स्मरण में मन को एकाग्र करने से ही मन स्थिर हो सकता है । जब मन प्रभु के स्मरण में लय के द्वारा लीन रहेगा, तो "एक पग भर भी" कहिए एक पल भी स्मरण से अलग नहीं होवेगा ॥१६॥
मन मूसा पंगुल भया, पी प्याला हरिनांव ।
रज्जब चलै न चल सकै, रह्या ठांव का ठांव ॥
मन चींटा भ्रमत फिरै, काया कुंभ मधि सोइ ।
नाम पताशा सौं लगै, तो बालकराम थिर होइ ॥
दृष्टांत - बालकराम जी महाराज कहते हैं कि मन रूपी चींटा, कायारूपी कुम्भ(घड़े) में, वासना द्वारा घूमता रहता है । जब नाम रूपी पताशे से इस मन रूपी चीटें को लगा दिया जावै, तो फिर इसकी चंचलता मिटने से स्थिर गति हो जाती है अर्थात् आवागमन मिट जाता है ।
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*जब अंतर उरझ्या एक सौं, तब थाके सकल उपाइ ।*
*दादू निश्चल थिर भया, तब चलि कहीं न जाइ ॥१७॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जब सजातीय, विजातीय भेद से रहित चैतन्य से भीतर अन्तर्मुख वृत्ति द्वारा मन लग जाय, तो फिर तीर्थ, व्रत आदि बहिरंग साधन अनावश्यक हैं । ब्रह्म वृत्ति होने पर मन की विषयाकार समस्त वृत्तियाँ भी ब्रह्मकार हो जाती हैं । फिर बहिरंग साधनों में कदापि प्रवृत्ति नहीं होती है ॥१७॥
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*दादू कौवा बोहित बैस कर, मंझि समंदाँ जाइ ।*
*उड़ि उड़ि थाका देख तब, निश्चल बैठा आइ ॥१८॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! कौवा रूपी मन सत्संग रूपी "बोहित", कहिए जहाज में बैठ कर, एकाग्र होकर, समुद्र रूप ब्रह्म में संलग्न होता है । तब श्रवण, मनन, निदिध्यासन, विवेक, वैराग्य आदिक साधनों द्वारा माया में निर्मल होकर परमेश्वर का प्रत्यक्ष परिचय करके स्वस्वरूप में लीन होता है ॥१८॥
मन कौवा निश्चल भया, सत संगति बोहित पाइ ।
जगन्नाथ जग सार नहिं, नांव बिड़द पर आइ ॥
त्रिभंगी छंद
जोये मन कागा, उड़ उड़ भागा,
विषिया लागा, अनुरागा ।
तन लाया दागा, मती अभागा,
कबहुँ न जागा, सुख सागा ॥
बोहिथ सतसंगा, लागै रंगा,
तजै कुसंगा, नाम धरी ।
ये सुमिरण गंगा, नहाइ विहंगा,
ध्याय सुरंगा, दास हरी ॥
(क्रमशः)

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