॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= मन का अंग १० =*
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*यहु मन कागद की गुडी, उड़ी चढी आकास ।*
*दादू भीगे प्रेम जल, तब आइ रहे हम पास ॥१९॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! यह मन कागज के पतंग की भाँति काम, क्रोध, लोभ, मोह से निर्मल होकर मन की ब्रह्माकार वृत्ति, ब्रह्म देश में संलग्न हुई । जैसे कागज की पतंग उड़ती हुई जल से भीग कर उड़ाने वाले के पास आ गिरती है, तद्वत् ही सूक्ष्म संस्कार रूप जो वृत्ति थी, वह प्रेम - जल से भीगकर कहिए, संतृप्त होकर "आय रहे हम पास" ब्रह्म - स्वरूप में विलय हो जाती है ॥१९॥
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*दादू खीला गार का, निश्चल थिर न रहाइ ।
*दादू पग नहीं साँच के, भ्रमै दहदिशि जाइ ॥२०॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं! जैसे गार के टीले में रोपा हुआ खूंटा स्थिर नहीं रहता, ऐसे ही मन रूपी खूंटा सांसारिक विषयों में लगा हुआ स्थिर नहीं होता । संसार में ही वासना द्वारा भ्रमता रहता है । सतगुरु महाराज कहते हैं कि सच्चे परमात्मा के निश्चल चरणों की जब तक शरण नहीं लेता, तब तक मन जन्म - जन्मान्तरों में भ्रमता रहता है ॥२०॥
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*तब सुख आनन्द आत्मा, जे मन थिर मेरा होइ ।*
*दादू निश्चल राम सौं, जे कर जाने कोइ ॥२१॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जो पुरुष सतगुरु की दया से अपने मन को राम - नाम में स्थिर करता है, उसकी आत्मा सदा परम आनन्दित रहती है, फिर उसको कोई भी सांसारिक कष्ट नहीं व्यापता है ॥२१॥
(क्रमशः)

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