गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

= मन का अंग १० =(२२/२४)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*मन निर्मल थिर होत है, राम नाम आनंद ।*
*दादू दर्शन पाइये, पूरण परमानन्द ॥२२॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जिनका मन मल - विक्षेप से शुद्ध होकर राम - नाम स्मरण में स्थिर होता है, ऐसे पुरुष पवित्र होकर परमेश्वर का भीतर और बाहर साक्षात्कार करते हैं ॥२२॥ 
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*विषय विरक्ति*
*दादू यों फूटे थैं सारा भया, संधे संधि मिलाइ ।*
*बाहुड़ विषय न भूँचिये, तो कबहुँ फूट न जाइ ॥२३॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! यों कहिये, पूर्वोक्त प्रकार से "फूटे थैं" नाम विषयासक्त जो मन है, वह विवेक व वैराग्य से "सारा" नाम ईश्वर - परायण हुआ है । कैसे ? "संधे संधि मिलाइ" अर्थात् आत्मा परमात्मा की एकता हुई । "बाहुड़ विषय न भूंचिये" फिर विषयों को नहीं भोगता है । अब कभी भी मन ईश्वर - विमुख नहीं होता है ॥२३॥ 
येता फाटे ना जुड़े, दूध रु मोती मन । 
यह संतों की साख है, पहले राख जतन ॥ 
मन चलणी छेदहु घणे, भूंचे विषै विकार । 
लेप लाइ हरि नाम का, लहै राम रस सार ॥ 
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*दादू यहु मन भूला सो गली, नरक जाणै के घाट ।*
*अब मन अविगत नाथ सों, गुरु दिखाई बाट ॥२४॥* 
टीका - ब्रह्मऋषि सतगुरु यह उपदेश करते हैं कि हे जिज्ञासुओं ! यह मन जिस "गली" में कहिए विषय थाप्रवृत्ति रूप अधम मार्ग में स्वस्वरूप को भूल कर जा रहा था, सो तो "नरक जाणै के घाट" नाम संसार में जन्म मरण रूप दुःख का कारण है । अब यह मन उस कुमार्ग को भूलकर अर्थात् छोड़कर गुरु के बताये हुए परमेश्वर प्राप्ति के श्रेष्ठ मार्ग पर चलने लगा है ॥२४॥ 
(क्रमशः)

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