शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

= मन का अंग १० =(२५/२७)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*दादू मन सुध साबित आपणा, निश्चल होवे हाथ ।*
*तो इहाँ ही आनन्द है, सदा निरंजन साथ ॥२५॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! यह मन निर्विषय और पूर्णतया निश्चल हो तो स्वस्वरूप निरंजन की अभेदता का परमानन्द इस मनुष्य जन्म में ही सर्वदा के लिये प्राप्त कर सकता है ॥२५॥ 
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*जब मन लागै राम सौं, तब अनत काहे को जाइ ।*
*दादू पानी लौंन ज्यों, ऐसैं रहै समाइ ॥२६॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जब यह मन ब्रह्म विचार में लयलीन हुआ तो अन्य साधनों में, बाह्य विषयों में फिर आसक्त नहीं होगा । किन्तु हे सज्जनों ! जिस प्रकार नमक पानी में मिलकर एक होता है और उसमें कोई भेद नहीं रहता है, इसी तरह अपने मन को परमेश्वर में ही अभेद करिये ॥२६॥ 
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*ज्यों जल पैसे दूध में, ज्यों पानी में लौंन ।*
*ऐसैं आत्मराम सौं, मन हठ साधै कौंन ॥२७॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे दूध में पानी और पानी में नमक अभेद होता है, ऐसे ही उत्तम जिज्ञासु एकत्व के अभ्यास द्वारा मन को स्वस्वरूप में अभेद करता है ॥२७॥ 
(क्रमशः)

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